जौनसार का लोकगीत हारुल

हारुल की एक तस्वीर, साभार गूगल

जौनसार आज भी अपनी पौराणिक संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहाँ के लोगों में आपसी प्रेम और सोहार्द की भावना आज भी ज्यों की त्यों है। इसी का एक उदाहरण है यहाँ का गीत संगीत। इन गीतों की एक खासियत है कि ये चाहे धीमा संगीत हो या बहुत तेज बजने वाला संगीत, दोनों में झूमने की प्रथा है। इन गीतों में एक अलग तरह की मिठास होती हैं जिस वजह से यह दिमाग में रच बस जाते है। ऐसे ही इनके नृत्य भी होते हैं, जो हमेशा समूह में किये जाते हैं। ऐसा नहीं कि यहाँ जोड़े में नृत्य नहीं होता पर उस जोड़े को बीच में रखकर उनके आसपास बाकी लोग भी समूह में नृत्य करते हैं। इनके नृत्य की सबसे अच्छी बात है की इसमें एक दूसरे का हाथ पकड़ कर नृत्य किया जाता है। चाहे वो किसी भी तरह का गीत हो।
जौनसारी संस्कृति के लोक नृत्य -बारदा, नाटी और हारुल हैं ।

आज मैं जिस लोकगीत की बात कर रही हूँ उनमें से एक है “हारुल”। जिसके विषय में मैं आपको संक्षिप्त में बताऊँगी।

क्या है हारुल ?

वैदिक काल में जब पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाले लोग बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं होते थे, या यूँ कहूँ कि कई लोग तो बिल्कुल पढे लिखे नहीं होते थे। उस दौरान पहाड़ों के इतिहास को वहाँ के लोग लोकल धुनों और लोक नृत्यों के माध्यम से जीवित रखते थे। जैसे कि- ताँदी, रौंसों, जैंता, बाजूबंद, छौपाती और हारुल आदि।

हारुल एक रस प्रधान लोक गीत

बहुत ही वीरता और साहस वाले कार्य करने वाले व्यक्तियों के विषय को बताने के लिए ही खासकर हारुल गाई जाती है। मगर धीरे धीरे समय के साथ हारुल के विषय में भी परिवर्तन और विस्तार होने लगा। पहले हारुल का केवल वीर रस और करुण रस के भाव के साथ ही गायन और नृत्य होता था मगर अब हारुल को वीर रस के साथ साथ शृंगार रस में भी गाया जाने लगा है।

कब गाई जाती है हारुल?

हारुल खासकर क्षत्रियों का नृत्य है उन्हीं लोगों में इस नृत्य को निभाने की प्रथा है। हारुल को जौनसार में विशेष तौर पर माघ के मेले के समय गाया जाता है। या किसी वीर की गाथा को सुनाने के लिए किसी अवसर पर इस पर नृत्य किया जाता है। और शृंगार रस की हारुल को खुशियों और त्योहारों के समय गाया जाता है। शादियों के मौकों पर भी हारुल पर नृत्य किया जाता है। एक तरफ पुरुषों की टोली और दूसरी तरफ महिलाओं की टोली हाथ से हाथ मिलाकर इसकी ताल पर अपनी कमर और पैरों की धाप से तालमेल बैठाकर इस नृत्य पर झूमते हैं जो कि देखने में बहुत मनमोहक होता है।

-सुजाता देवराड़ी

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