मकर संक्रांति कब और क्यों मनाई जाती है

गूगल साभार

भारत एक संस्कृतियों का देश है जहाँ हर जगह के अपने अपने रीति रिवाज और संस्कृति है। उन्हें मनाने के अपने अपने तरीके है। अपनी बोली भाषा है अपनी वेशभूषा और अपने त्योहार हैं। ऐसा ही एक त्यौहार है। मकर संक्रांति जो पूरे भारत में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्योहार की एक खासियत है कि इसे हर जगह अलग अलग तरीके से मनाया जाता है और इसके नाम भी हर जगह अलग अलग है।
मकर संक्रांति क्या है ? इसे कब और क्यों मनाया जाता है। ? कहाँ किन नामों से ये त्यौहार प्रसिद्ध है? इसके पीछे का इतिहास क्या है? इस विषय में आज मैं आपको बताऊँगी।

क्या है मकर संक्रांति ?

मकर संक्रान्ति यानि घुगुतीया त्यौहार हिंदुओं का प्रमुख पर्व है। इसे उत्तरायणी त्यौहार भी कहा जाता है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाई जाती है। कहा जाता है कि पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान में यह त्योहार हर बार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है।

इस त्यौहार में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। पूरी, हलवा, खीर, पकौड़ी, तिल के लड्डू , गुड़ तिल और मीठे घुगुते बनाकर इसको खास बनाया जाता है। नए कपड़े बनाकर सुबह पूजा पाठ कर सूर्य भगवान को जल और भोग लगाया जाता है। कई जगह तो इस त्यौहार के दिन मेलों का आयोजन भी किया जाता है। लोग अपनी छतों पर जाकर रंग बिरंगी पतंगों को आसमान में उड़ाकर इस त्यौहार का आनंद लेते हैं। मकर संक्रांति के दिन प्रकृति भी अपना रूप बदलने लगती है। इस दिन के बाद से धीरे धीरे दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी ।

पुण्य पर्व के रूप में क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति?

उत्तरायन देवताओं का अयन है इसलिए इस त्यौहार को पुण्य पर्व माना जाता है। इसी पर्व से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। माना जाता है कि उत्तरायन में मृत्यु होने से मोक्ष प्राप्ति की संभावना रहती है। सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर 6 महीने दक्षिण दिशा की ओर से तथा 6 महीने उत्तर दिशा की ओर से होकर पश्चिम दिशा में अस्त होता है।

शास्त्रों के अनुसार उत्तरायन का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है, इन्हीं शास्त्रों में उत्तरायन को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है। मकर संक्रांति के बाद माघ मास में उत्तरायन में सभी शुभ कार्य किए जाते हैं।

मकर संक्रांति के दिन भगवान भास्कर (सूर्य) अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं क्योंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं । इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चयन किया था। इस त्यौहार के बाद माघ के महीने में जो व्यक्ति अपनी देह त्यागता है उसे मोक्ष की प्राप्ति का उल्लेख गरुण पुराण में भी किया गया है।

कथाओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। जिस वजह से इस दिन गंगाजी में स्नान करना बहुत शुभ माना जाता है।

भारत के किन किन राज्यों में और किस नाम से मनाई जाती है मकर संक्रांति?

भारत के अलग अलग प्रदेशों में मकर संक्रांति अलग अलग नाम से मनाई जाती है यह नाम निम्न है।
प्रदेश पर्व
छत्तीसगढ़ में- मकर संक्रांति
तमिलनाडु में -ताई,पोंगल गोआ
हरियाणा में- माघी
बिहार में- खिचड़ी
कर्नाटक में- मकर संक्रमण
महाराष्ट्र में- मकर संक्रांति
मणिपुर, असम में- भोगाली और बिहू
उत्तरप्रदेश में -खिचड़ी
उत्तराखंड में – उत्तरायणी, घुगुतीया और मकर संक्रांति
पश्चिम बंगाल में- पौष संक्रांति
गुजरात में -उत्तरायण
हिमांचल प्रदेश में – माघी
पंजाब में- लोहड़ी
नेपाल में- माघे संक्रान्ति या खिचड़ी संक्रान्ति
जम्बू कश्मीर में – शिशुरसेक्रांत के रूप में मनाई जाती है।

कैसे मनाई जाती है मकर संक्रांति ?

नेपाल में मकर संक्रांति
नेपाल में इस त्यौहार को मनाने के लिए वहाँ की सरकार सार्वजनिक छुट्टी देती है। थारु समुदाय का यह प्रमुख त्यौहार है। इस दिन वहाँ पकवानों में तिल के लड्डू और घी खाया जाता है और दान पुण्य करके नदी संगम में स्नान करते हैं। वहाँ रुरुधाम यानि देवघाट व त्रिवेणी मेला सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

भारत में मकर संक्रान्ति
सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्यौहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं हैं।

हरियाणा और पंजाब में इस त्यौहार को लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल, मूंगफली और भुने हुए मक्के की आहुति देकर परिक्रमा की जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियां आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बेटियाँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है। ये बात मुझे इसलिए भी पता है क्योंकि मैंने भी छेः साल लोहड़ी मनाई है जब मैं अपनी जॉब पर थी। क्योंकि जहाँ मेरा ऑफिस था उसके मालिक पंजाबी थे और ऑफिस घर में बनाया गया था इसलिए वहाँ हर साल लोहड़ी बड़ी धूमधाम से मनाते थे।

उत्तर प्रदेश में यह त्यौहार मुख्य रूप से ‘दान का पर्व’ के रूप में मनाया जाता है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी से एक माह तक माघ मेला लगता है जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है।

उत्तराखंड में इसे घुगुतीया त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक घरों में 13 तारीख की रात को घुघुते बनाए जाते हैं फिर उसे तेल में तलकर अगली सुबह स्नान के बाद जल के साथ सूर्य भगवान को अर्पित किया जाता है। इस दिन पूरी पकवान को छत पर जाकर कोवों को बुलाया जाता है और उनसे मन्नतें माँगी जाती है। इस दिन रात को गाँव की सभी महिलायें पुरुष आपस में चाँचड़ी लगाकर इस त्यौहार मनाते हैं। यहाँ चौदह दिसंबर से लेकर चौदह जनवरी तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है।

कुमाऊँ गढ़वाल में तो इस त्यौहार का बहुत अधिक महत्व है। वहाँ लोग एक दिन पहले ही आते के घुगुते बनाकर धूप में सुखाते हैं और फिर रात में उन्हें तेल में तलकर उनकी माला बनाकर रखा जाता है। इस त्योहार में बेटियाँ अपने मायके आती है और जब त्यौहार के बाद अपने ससुराल जाती है तो गले में इन घुगुतों की माला पहनाई जाती है। यहाँ इस त्यौहार पर बच्चों के गले में इनकी माला पहनाई जाती है और बच्चे माला पहन कर खूब नाच गान करते हैं।

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में इस दिन बहुत बड़ा मेला लगता है और वहाँ गंगा में स्नान करने की प्रथा काफी प्रचलित है। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जात है ।

बिहार में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी नाम से जाना जाता है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है।

महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल गुड़ नामक हलवे को बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते समय बोलते हैं -“तिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला” अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।

तमिलनाडु में इस त्यौहार को मनाने का सबसे अलग तरीका अपनाया जाता है। यहाँ इस दिन को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।

मकर संक्रांति का महत्व

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है।

सामान्यतया सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है।

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