खलंगा मेला – 24 नवम्बर 2019

खलंगा मेला 2019

आदिकाल से ही इनसान घुमक्क्ड प्रवृति का रहा है। घुमक्क्ड़ी हमे विरासत में मिली है। आज भी शायद ही कोई हो जिसे घूमना पसंद ना हो। आज के दौर में तो घुमक्क्ड़ी और ज्यादा प्रचलित हो चुकी है। क्योंकि सेल्फी लेने का जो बुखार हम सब पर चढ़ा है, उसके लिए नई- नई जगह जाना अब आम बात सी हो गई है। और हर जगह की फोटो को फेसबुक और सोशियल मिडिया पर अपलोड करना तो एक फैशन सा बन गया है। देखा जाए तो सही भी है, और गलत भी।

ख़ैर ये बात कुछ यूँ छिड़ी कि, घूमने का मुझे भी बहुत शौक़ है। और मुझे अच्छा लगता है जब में किसी अनजानी या नई जगह जाती हूँ।  मुझे वहां जाकर अच्छा या बुरा जो भी लगे , वो एक दूसरे के साथ बाँटना (साझा या शेयर करना) अच्छा लगता है। आमतौर हम लोग जब कहीं घूमने जाते हैं तो पहले योजना (प्लान) बनाते  हैं , फिर उस विषय में चर्चा करते हैं और फिर जाते हैं। सही भी है, क्योंकि आपको पता होता है कि, आप उस जगह जाकर क्या कुछ नया करने वाले हो, या वहाँ की क्या कुछ ख़ास चीज़ें देखने वाले हो।  लेकिन मेरे साथ थोड़ा अलग होता है। मुझे कभी- कभी बिना योजना (प्लान) बनाये कहीं भी अचानक निकल जाना बेहद पसंद है। और खासतौर पर तब जब मैं उस जगह से बिल्कुल अनभिज्ञ (अंजान) हूँ।  मन में कई तरह के सवाल और कई तरह की उत्सुकता पनपती है। वहाँ जाकर कुछ चीज़ें मन की जगी उत्सुकता पर खरी उतरती हैं।  और कुछ नहीं। ऐसा ही दो दिन पहले 24 नवम्बर 2019 रविवार (सन्डे ) को कुछ मेरे साथ हुआ।  


हुआ कुछ यूँ कि, छुट्टी के दिन सभी को अपने घर के काम करने होते हैं, और फिर थोड़ा समय (टाइम) निकाल कर पूरे हफ़्ते की भागदौड़ से निजात पाने के लिए, घूमने भी जाना  होता है।  कुछ लोग जा पाते हैं कुछ लोग नहीं। मैं भी उस दिन अपने काम करने मैं व्यस्त (बिजी ) हो गई। और कहीं बाहर  निकलने का ख्याल भी मेरे दिमाग में नहीं आया।  और अपनी पढाई करने लगी। फिर अपनी किताब लेकर एक पेज पढ़ा ही था कि, अचानक फ़ोन की घंटी बजी और मैंने फ़ोन की तरफ देखा तो बबली दीदी का  कॉल था।

मैंने बात की तो वो मेरा हाल चाल लेने लगी  कुछ देर की बातचीत बाद उन्होंने कहा कि, 

“चल कहीं घूमकर आते हैं। “

मैंने भी बिना सवाल किये हामी भर दी और फ़ोन काट कर, तैयार होकर उनकी दुकान की तरफ चल दी। दूकान मतलब पार्लर से है।  वो पार्लर चलाती है।  और हमलोग उनको पार्लर वाली दीदी भी कहते हैं।  जब मैं पार्लर पर पहुँची तो दीदी हँसने लगी।  उनके साथ मैं भी हँसने लगी। उन्हें शायद यकीन नहीं था कि मैं आ जाऊँगी। उनका यकीन ना करना गलत भी नहीं था।  क्योंकि वो कभी -कभी सबका बेवकूफ बना देती है। मज़ाक करती है।  जब वो पार्लर में बोर हो जाती हैं , तो सबको  घूमने के बहाने पार्लर पार्लर बुलाकर गप्पें मारने लगती हैं।

तो मैंने उनसे पूछ ही लिया ।“दीदी जाना कहाँ  है? कही आज भी  मेरा बेवकूफ  नहीं बना दिया आपने ?” 

तो हँसते हुए जवाब आया ” मेला”

मैं और जोर से  हँसने लगी।

तो दीदी  ने कहा  ”  चुप कर ये बता खलंगा चलेगी?”

“ये कौन  सी जगह है? ” मैंने उनसे पूछा।

तो दीदी मुझे कहने लगी “तपोवन से आगे एक जगह है नालापानी,   वहां भी बहुत आगे  एक जगह है “खलंगा”  जहाँ गोरखालियों  का मेला लगता है।”

मैंने उनसे फिर सवाल किया ” कौन कौन जा रहा है? आप गए हो कभी?”

तो दीदी  मुस्कुराकर कहने लगी ” नहीं -नहीं पागल मैं भी पहली बार जा रही हूँ।   कल अखबार में खबर छपी थी तो आज सुबह  मन बनाया “

“यार दीदी आप भी कतई दुष्ट हो रहे हो “

दोनों हंसने लगे।  वो मेला किस उपलक्ष्य में लगता है उनको भी मालूम नहीं था। तभी अचानक दो दीदियाँ और आ गईं। वो भी जोर जोर से हंसने लगी।

 तभी एक दीदी ने कहा ” यार ये बबली भी अजीब पागल है. बिन बताये कहीं भी चलने को बोल देती है।  घर में पति और बच्चों को समझाना मुश्किल हो जाता है ” 

फिर हम लोग  2 या 4 मिनट बाद एक्टिवा में दुकान से निकल गए। नेहरू कॉलोनी से होते हुए हम लोग 6 नंबर पुलिया पर रुके।  तभी एक और आंटी जी हमारे साथ आ गईं।

मैंने बबली  दी को कहा “आपने सबको पहले बता दिया था क्या? “

तो हँसकर उन्होंने कहा ” मैंने सबको तेरे बाद ही कॉल किया “

सब लोग हँसने लगे, और मस्ती करते हुए आगे चले गए। जहाँ तक हमको रास्ता पता था, वहाँ तक तो हम निकल गए।  पर फिर आगे के रास्तों से अनजान हम लोग आसपास के लोगों से पूछते हुए, आखिरकार ‘खलंगा’ पहुँच ही गए। रास्ते में बहुत भीड़ जमा थी, और गाड़ी पार्क करने में मदद के लिए  पुलिस तैनात थी। हमने अपनी गाड़ियाँ पार्क की और पैदल चलने लगे।   लगभग एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम लोग मेले में पहुँच गए।

मेले का द्वार  ठीक- ठाक बना था।  तो  हमने द्वार पर फोटो खिचवाई और आगे चल दिए।
में भीड़ तो बहुत थी,  मगर दुकाने उतनी तादाद (संख्या)में नहीं लगीं थी। लेकिन यह जगह बहुत ख़ूबसूरत थी। चारों तरफ हरा भरा जंगल और बीचों बीच सड़क और एक मैदान। जो न बहुत छोटा था, ना अधिक बड़ा।  चारों तरफ कुर्सियां लगी थी, जहाँ सम्मानित व्यक्तियों के लिए दायीं तरफ कुर्सियां थी।  तो बायीं तरफ खाने के स्टॉल लगे थे।  जिनमें सारी गोरखा (नेपाली) व्यंजन सजे थे। सामने मंच पर एक महानुभाव (व्यक्ति) भाषण दे रहे थे। वो आज़ादी के बारे में बता रहे थे। उनके शब्द कुछ इस प्रकार थे।

” हमारे गोरखा रेजिमेंट ने बिना अपने प्राणों की परवाह किये बगैर, ब्रिटिश सत्ता को अपने देश पर हावी नहीं होने दिया।  अपनी आखरी साँस तक वो लड़ते रहे।  उनके पास हथियार के नाम पर केवल खुंखरी और कुल्हाड़ी ही थी, जबकि ब्रिटिश सैनिकों के पास बहुत किस्म के गोला  बारूद और हथियार थे। फिर भी गोरखा रेजिमेंट ने उनको पूरी टक्कर दी। नालापानी पर्वतीय शृंखला के सबसे ऊंचे शिखर पर सेनानायक वीर बलभद्र थापा एवं उनके वीर सैनिकों का सुदृढ़ खलंगा किला आज भी गर्व से मस्तक उठाए खड़ा है।”

उनके भाषण सुनकर मेरे दिमाग में सौ तरह के सवालों ने जन्म ले लिया।  जिनमें पहला सवाल तो ये था कि, इस मेले का उद्देश्य क्या है. ? तभी हमारे साथ की एक दीदी ने मेरा हाथ खींचा, और मुझे एक दुकान पर ले गई।  वो नाक, कान छिदवाने वाले अंकल की दुकान थी।  उस दीदी  ने  दुकान पर जाकर अपने कान छिदवाये और एक  जोड़ी कान की बाली ली। फिर हम लोग बच्चों के झूले पर गए और दूसरी दीदी ने अपनी बेटी को झूले पर झुलाया। बड़ा झूला होता तो  हम भी झूल लेते।  पर हमारे मन की हुई नहीं।

इधर- उधर भटकने के बाद पेट में चूहे भी उछल कूद मचा रहे थे। इसलिए अब हम लोग ऊपर पहाड़ी की तरफ चलने लगे। पहाड़ी पर भंडारा लगा हुआ था। सब लोग भंडारे में बैठे हुए थे।हम भी जमीन पर बिछी चटाई पर बैठ कर  खाने का इंतज़ार करने लगे।  ज़मीन पर बैठकर  खाने का अपना अलग ही मजा है।  गाँव की याद ताजा  हो गई थी, जब शादियों में जमीन पर खाया जाता था।  कुछ देर बाद एक व्यक्ति कागज की थाली लेकर आया, फिर दूसरा व्यक्ति चावल और तीसरा व्यक्ति दाल देकर आगे बढ़ा।  हम लोगों ने खाना शुरू किया।  और कुछ देर बाद अपनी थाली को उठाकर एक कोने में रख दिया।

भंडारा में भाग लेते लोग

पहाड़ी से नीचे उतरते समय दीदी लोग फोटो खींचने में व्यस्त हो गए।  कुछ फोटोज मैंने भी ले ली।

उसी भंडारे वाली जगह पर मैंने एक आंटी को देखा।  वो आंटी  पूरे पारम्परिक वेशभूषा पहने हुए थी। उनको देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।  क्योंकि अपनी संस्कृति से जुडी वेशभूषा को धारण करना अपने आप में ही बड़ा आनंदमयी होता है।  आँखों को एक अलग ही सुकून मिलता है।  फिर मैंने जाकर एक आंटी से  मेले के विषय में पूछा।

तो उन्होंने मुझे बताया कि, ” ये मेला हर साल गोरखा रेजिमेंट के सेनानायक वीर बलभद्र थापा और उनके सैनिकों की याद में मनाया जाता है” 

“किसी युद्ध की विजय गाथा इस मेले से जुडी है?” मैंने सवाल किया।

तो उन्होंने मुझे बताया “1816 में इसी जगह  अंग्रेजों और नेपालियों के बीच गोरखा युद्ध हुआ था। इसलिए वीर सैनिकों के बलिदान को गोरखा रेजिमेंट हर साल मेले के रूप में मनाते हैं। उनके बलिदान को याद करते हैं। ये 45 वां खलंगा मेला है।  यहाँ से बहुत आगे एक चोटी पर उनके नाम का मंदिर भी बनाया गया है। जिसे चन्द्रयानी मंदिर कहते हैं  और खलंगा स्मारक भी। तुमको अगर जाना है तो जाकर आओ बहुत अच्छी जगह है।”

मैंने भी मुस्कुराकर आंटी को शब्दों से धन्यवाद किया। इतना कहकर वो आंटी वहां से चली गई। तभी  मेरे  कानों मैं किसी पुराने गाने की धुन गूँज पड़ी। और मेरे कान सतर्कता के साथ इधर उधर धुन को ढूंढने लगे। वो इसलिए हुआ क्योंकि संगीत से मुझे बेहद लगाव है।  तभी मेरी नज़र नीचे मेले पर पड़ी। जहाँ एक लड़की मंच पर गाना गा रही थी।
जिस के बोल थे “आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूँ ” 

मैं ख़ुद को रोक ना पाई और नीचे मैदान पर आ गई। एक जगह बैठकर उस गीत का लुत्फ़ (आनंद ) उठाने लगी और ख़ुद भी गुनगुनाने लगी।
वो सांग “क़िस्मत” फिल्म का था जिसे “आशा भोंसले” जी ने अपने मदभरे अंदाज में बख़ूबी गाया था. इतने में मेरे बाकी साथी भी आकर मेरे पास बैठ गए। और फिर कुछ देर तक वहां रंगारंग कार्यक्रम चलते रहे।  नेपाली डांस और नेपाली गीतों  सिलसिला चलता रहा।  फिर कुछ कलाकारों ने एक कुमाउँनी  गीत में भी नृत्य (डांस) किया। मंच पर होते कार्यक्रमों को देख मेरा मन भी डांस करने का किया, पर किसी तरह मैंने मन को समझा लिया। लेकिन पैरों ने अपनी जगह पर थिरक कर कलाकारों का पूरा साथ दिया।

हाहाहाहाहा।

तभी एक अंकल ने मेरे पसंदीदा गीत को गा कर मेरा मन प्रसन्न दिया।
उस  गीत के बोल थे “लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो ना हो , शायद फिर  में मुलाक़ात हो ना हो।”

 ये गीत 1964 में बनी फिल्म “वो कौन थी ” का है।  जिसे लता मंगेशकर जी ने  अपनी दिलक़श आवाज़ में गाया था।

यह पेड़ और इस पर बँधी चुन्नियाँ आकर्षक लग रही थीं तो इनकी फोटो ले ली 


पारम्परिक परिधानों में मौजूद कुछ युवतियाँ

उसके बाद गोरखा रेजिमेंट के बैंड ने भी प्रस्तुति देकर सबका मन मोह लिया।  सभी लोग कार्यक्रम आनंद उठा रहे थे। बच्चे इधर उधर भाग रहे थे.  बड़े बुजुर्ग आसपास की जगहों पर बैठे हुए थे।  मेले मैं सब कुछ था। भीड़ भी बहुत ज्यादा थी,  पर बाज़ार की कमी थी।  क्योंकि बिना बाज़ार के मेले जैसी जगहों की रौनक कम लगने लगती है।  जिसे मैंने ही नहीं सबने महसूस किया। इतनी ख़ूबसूरत जगह होने के बाद भी बाज़ार  की कमी ने माहौल को थोड़ा फीका कर दिया।  ऐसा लग रहा था कि, लोग यहाँ सिर्फ तस्वीरें (फोटोज़ ) लेने आये हैं।  जिधर देखो वहीं लोग कभी सेल्फी तो कभी समूह (ग्रुप) में फोटो लिए जा रहे थे।  प्रेमी जोड़े भी बाहों में बाहें डाले एक दूसरे से बातों में तल्लीन (खोये हुए ) थे।  मेरा भी खरीदारी का मन तो था , पर कुछ ख़ास मन को भाया नहीं, इसलिए कुछ लिया भी नहीं।  हाँ, दीदी लोगों ने थोड़ा बहुत कुछ ले लिया था।  तभी मंच से पुरस्कार वितरण की घोषणा हुई।  और सबकी  नज़रें एक बार फिर मंच की तरफ हो ली।  फिर कलाकारों को पुरस्कार दिया गया।

एक बात जो मुझे इस मेले में ख़ास लगी वह यह थी कि ‘ मंच का संचालन’  पूरा नेपाली भाषा में हो रहा था।  एक महिला के द्वारा मंच का संचालन, वो भी उनकी पारम्परिक वेशभूषा के साथ, अपने आप में अलग सा माहौल बना रहा था। उनके संचालन में उनका अपनी भाषा के प्रति प्रेम और अपने परिधान के प्रति ख़ुशी और इज्ज़त दोनों साफ़ -साफ़ नज़र आ रही थी।
हम लोग भी अब घर के लिए मेले से बहार आ गए। और सब अपने -अपने घर पहुँच गए थे । मेले को लेकर मन में जो सवाल बाकी थे उनका जवाब तो मुझे ढूँढना ही था। कहते हैं कि, जब किसी परंपरा का इतिहास किसी बड़े रोचक उद्देश्य से जुड़ा हो, तो उसके बारे मैं  सबकुछ जानने की उत्सुकता  मन को चैन से रहने नहीं देती  है।  ऐसा  ही मेरे मन के साथ भी हुआ। 1816 के इतिहास के विषय में  जानने की लालसा ने मुझे बैचेन कर दिया। इसलिए मैंने घर आकर थोड़ा आराम करने के बाद अपना लेपटॉप लिया और खलंगा की जानकारी गूगल पर ढूंढने लगी। गूगल करने के बाद  कई चीज़ें सामने आयी।  जिसका ज़िक्र करना बहुत जरुरी है। वैसे इंटरनेट टेक्नोलॉजी ने हमारी जिज्ञासाओं को पूरा करने में हमारा भरपूर साथ दिया है।  इसलिए मैं व्यक्तिगत तौर पर गूगल को धन्यवाद कहना चाहती हूँ।  क्योंकि जब भी मुझे कोई सवाल परेशान करता है तो गूगल महाशय उसका समाधान दे ही देता है।

चलिए अब मैं आपको खलंगा के इतिहास के विषय में बताती हूं ।

सन् 1814  से 1816 में  चला अंग्रेज-नेपाल युद्ध (गोरखा युद्ध) उस समय के नेपाल अधिराज्य (वर्तमान संघीय लोकतांत्रिक गण राज्य) और ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच में हुआ था। जिसमें गोरखाली तथा उत्तर भारत के गढ़वाली, कुमाऊंनी और स्थानीय लगभग 600 वीर एवं वीरांगना योद्धाओं ने सेनापति बलभद्र थापा के नेतृत्व में अदम्य साहस का परिचय देते हुए, तीन बार अंग्रेजों के आक्रमण को पूरी तरह से विफल कर दिया था। इस युद्ध में सेनानायक बलभद्र थापा के केवल 600 सैनिकों जिनमें वीर, वीरांगना और बच्चों ने भी अपने प्राचीन हथियार, धनुष, त्रिशूल, भाला, बरछी, खुखरी आदि  आधुनिक हथियारों  से  लगभग 3500 से भी अधिक अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए थे। जिसका परिणाम सुगौली संधि में हुई और नेपाल ने अपना एक-तिहाई भूभाग ब्रिटिश हुकुमत को देना पडा था । इस युद्ध से अमर सिंह थापा,बलभद्र कुँवर एवं भक्ति थापा के शौर्य, पराक्रम एवम् राष्ट्रप्रेम की कहानी अंग्रेजी राज्यो में  प्रचलित हुई थी।


खलंगा को गोरखा किला के नाम से जाना जाता था। युद्ध में अंग्रेजी सेना के जनरल गैलेप्सी मारे गए। युद्ध के अंत में गोरखा किले को अंग्रेजों ने अपने आधिपत्य में ले लिया था, लेकिन बलभद्र एवं उनके साथी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे।


गूगल जानकारी से ये भी पता चला कि,वीर सेनानायक बलभद्र थापा एवं उनके वीर सैनिक चंद्रयानी मंदिर में प्रतिदिन पूजा-अर्चना किया करते थे। इसलिए हर साल मेला शुरू होने से पहले इस मंदिर में पूजा अर्चना का विधान है। मान्यता यह भी है कि, इस मंदिर पर किसी भी छत जैसा निर्माण किए जाने पर छत टिकती नहीं है। इसलिए इस मंदिर की कोई छत नहीं है।  वाकई ये जानकारी अचंभित (Surprise)कर देने वाली है।  

मेरा ये रविवार(संडे) कुछ ऐसा बीता।  आपने क्या अलग किया इस संडे ? मुझे कमेंट  बताइयेगा।  

हँसते, मुस्कुराते, स्वस्थ रहिये। ज़िन्दगी यही है।  

आप मुझसे इस आईडी पर संपर्क कर सकते हैं.
sujatadevrari198@gmail.com


© सुजाता देवराड़ी

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