ढाई दिन की तनख्वाह


सुनो ! जरा दो चार सौ रुपये होंगे?

मदन ने शीशे में खुद की कमीज (शर्ट) को देखकर अपनी पत्नी शीला से कहा। शीला मदन के लिए टिफिन लेकर कमरे में आई थी। तो उत्तर में शीला ने कहा ।

शीला- “घर में कुल 500 रुपये पड़े हैं….  और अभी महीने के 15 दिन बचे हैं”।

मदन – ओह …. अच्छा चलो कोई बात नहीं, मैंने तो यूं ही पूछ  लिया। सोचा वन्दु के लिए एक फ्रॉक ले आऊँ, बहुत समय हो गया उसको नई फ्रॉक नहीं दिलाया।

शीला हंसने लगी, और शीला को देख मदन भी हंसते -हँसते अपने बाल बनाने लगा।  शीला मदन के कपड़े समेटने लगी, तभी शीला की नजर मदन की कमीज पर गई। जिसका बगल फटा हुआ था।  शीला समझ गई कि, मदन ने पैसों की ईछा क्यों जाहिर की । मदन बिना माँ बाप का एक ही बेटा है। उसके ‘पापा’ बचपन में ही उसे छोड़कर चले गए थे। और ‘माँ’ उसकी शादी के ठीक एक महीने बाद। काफी मुश्किल हालातों के बाद मदन ने खुद को संभाला । कुछ समय तक मदन ने घर पर ही छोटा -मोटा काम किया।  लेकिन जब उसे बेटी हुई तो घर के खर्चों ने अपने हाथ खोल दिए। मदन  ने बी0 ऐ 0 किया है और अब वह एक  कंपनी में जॉब करता है। मगर महीने की तनख्वा (सेलेरी) केवल 8 हजार मिलती है। उसी 8 हजार से अपनी बेटी के स्कूल का खर्चा और कमरे का किराया भी देता है। तीनों मेरठ के किसी कस्बे में एक छोटे से कमरे में रहते हैं। हालांकि छोटा परिवार है मगर कभी -कभी घर चलाना मुश्किल हो जाता है।  कभी शीला ख्वाहिशों में अपना हाथ तंग कर देती, तो कभी मदन। वक़्त जैसे -तैसे कट जाता। उस दिन भी यही हुआ।  मदन की कमीज की हालत देख बिना कुछ जाहिर किये  शीला ने अलमीरा से मदन के लिए एक दूसरी टी शर्ट निकाली और मदन पर लगा कर कहा-

शीला– ये लो ! आज आप ये पहन कर दफ्तर (ऑफिस) जाओ । इसमें तुम बहुत जचोगे।
  
“अरे नहीं -नहीं, मैं इसमें ही अच्छा हूँ” मदन ने अपनी शर्ट सही करके कहा। 
शीला- मतलब आप एक दिन मेरी पसंद के कपड़े नहीं पहन सकते हो ? हद है।  फिर कहते हो कि, मैं प्यार नहीं करती।
मदन ने मुस्कुराकर शीला को गले लगाया और मायूस हो गया। फिर चेहरे पर हंसी दिखाकर कहा-

मदन – अच्छा ठीक है बाबा मान ली तुम्हारी बात। और वेसे भी बीवियों से ज्यादा पंगा नहीं लेना चाहिए।

शीला – रहने दो।

मदन ने अपनी शर्ट उतारी और टी शर्ट पहन शीला को गले लगाकर ,अपने दफ्तर के लिए निकल गया। शीला की आँखें नम थी। उसने सामने टेबल से सुई  धागा निकाला और मदन की कमीज  सिलने लगी। तभी उसे याद आया, पिछले महीने ही उसने दूसरी कमीज को भी फटा हुआ देखा था। पर काम के चलते वो उसे  सिलना भूल गई थी। वो भागी -भागी छत पर गई, और कमीज उतार कर नीचे ले आयी।  फिर  दोनों कमीजों  को सुई  से सिलने लगी। और खुद से ही कहने लगी।

शीला- मुझे माफ़ करना प्रभु!  मैंने मदन से झूट कहा , मेरे पास पैसे थे पर वो पैसे मैंने मशीन के लिए जमा किये हैं । ताकि मैं सिलाई करके  मदन का बोझ हल्का कर सकूं।

उधर  मदन ऑफिस में ये सोचकर परेशान है कि, 8000 में घर का खर्चा कैसे चलेगा। अभी उसकी जॉब को भी ज्यादा टाइम नहीं हुआ था। तो अनुभव की  कमी के कारण उसे कहीं और दूसरी जॉब भी नहीं  मिल पाएगी। 
मदन सोच में ही था कि, उसे किसी ने जोर से आवाज़ दी-

” मदन- तुझे सर फ़ाइल लेकर बुला रहे हैं”। 

मदन ने हड़बड़ाहट में फ़ाइल उठाई और  चल दिया। कुछ देर बाद मदन कंपनी में अपने बाकी साथियों के साथ खाना खाने लगा। और गपशप का सिलसिला भी खाने साथ चलता रहा। तभी एक साथी ने कहा।

“यार ये एक तारीख भी जाने कब आएगी। मेरे बेटे का जन्मदिन है। और उसकी जिद है कि, उसे बड़ी साइकिल चाहिए”। 

मदन की कंपनी में  महीने की पहली तारीख को ही तनख्वा बांटी जाती है। तभी दूसरे साथी ने जवाब दिया।

“यार आजकल के बच्चों की डिमांड पूरी करना कभी- कभी महाभारत हो जाती है। ऊपर से हाथ में तनख्वा बाद में आती है। उसके जाने के बंदोबस्त (हिसाब) पहले हो जाते हैं”। 

ये सब सुनकर मदन चुप हो जाता है। और उसे अपनी सुबह की बात याद आ जाती है। इधर घर में शीला अपनी बेटी वन्दु को स्कूल से लेकर आती है। वन्दु  8 साल की है और कक्षा 2 में पढ़ती  है।  शीला वन्दु को खाना देकर सुला देती है। और एक घंटे के लिए एक किलोमीटर दूर, सिलाई सीखने जाती है। शीला ने बाहरवीं तक पढ़ा है।  पर घर के हालत और आस -पास का माहोल देख अभी उसने आगे ना पढ़ने का मन बनाकर, सिलाई करने का ही निर्णय किया। जबकि शीला को पढ़ने का बहुत शौक था । लेकिन कम उम्र में शादी होने के कारण उसकी इच्छाओं ने उसके हालातों के सामने घुटने टेक दिए। शीला से मदन का अपने लिए मन मारना अच्छा नहीं लगता था। इसलिए उसने चोरी छिपे मशीन सीख ना  शुरू कर दिया। और दो महीने सीखने के कुछ समय बाद वो अपने लिए हाथ की एक मशीन ले आती है। और कपड़े सिलना  शुरू कर देती है। मदन को ये बात मालूम नहीं होती है। क्योंकि शीला मदन को अपने हाथ से नई कमीज सिलकर तोहफा देना चाहती थी। वो रोज दिन में वन्दु को सुलाकर अपनी सिलाई करती है और रात को मशीन चारपाई के नीचे छुपा देती है। ईसी तरह  जैसे- तैसे ये महीना भी खत्म हो गया । और महीने की पहली तारीख को मदन अपनी तनख्वा लेकर घर आया। दोनों खुश हुए । तभी वन्दु जिद करने लगी कि, उसे बड़ी डॉल (गुड़िया) चाहिए । तो मदन उसे वादा करता  कि, कल लेकर आएगा। वन्दु पापा के गले लगती है और खेलते -खेलते उसी की गोदी में सो जाती है। मदन उसे चारपाई पर सुला देता है। फिर दोनों भी खाना खाकर सो जाते हैं।  रोज की तरह अगले दिन भी मदन अपने दफ्तर जाता है और शीला अपने कामों में लग जाती है। और दिन में राशन पानी लेकर वन्दु को स्कूल से घर ले आती है। ईसी तरह दो दिन बीत जाते हैं। और तनख्वा खत्म हो जाती है। अगली सुबह मदन दफ्तर के लिए तैयार होता है। तो शीला मदन को नई कमीज देकर कहती है।

शीला-  ये लो आज आप ये पहन कर ऑफिस जाओ। ये कमीज बहुत पुरानी हो गई है।और उसका रंग भी फीका पड़ गया। आप तो कुछ कहोगे नहीं। सोचा मैं ही ला दूँ।

मदन कमीज को देखकर खुश भी होता है और हैरान भी। फिर अपनी कमीज का बगल देखता है और उसे सिला हुआ देख कहता है।

मदन– अरे इसकी क्या जरूरत थी।  सिल तो दिया था तुमने, और वेसे भी कमीज का बगल कौन देख रहा है। लाना ही था तो वन्दु को एक फ्रॉक ला देती।

शीला – आप प्यार से पहन रहे हो, या डांट कर पहनोगे। अच्छा ये पहनो फिर एक खुशी की बात बताऊँगी। 
मदन कमीज  पहनता है और शीला उसका हाथ पकड़कर उसे जमीन पर चारपाई के नीचे कुछ देखने को झुकाती है। मदन मशीन को देखकर चौंक जाता है। और कहता है।

मदन- ये क्या है? और किसका है। ? यहाँ क्या काम है इसका ?
 
शीला – ये मैंने खरीदा है घर के खर्चे से बचाकर। और ये कमीज मेरी तरफ से आपको तोहफा है। मैंने अपने हाथों से आपके लिए बनाई है. मेरी ढाई दिन की मेहनत की तनख्वा से ।

मदन अपनी कमीज पर हाथ फेरता है और थोड़ा भावुक होकर कहता है।

मदन- तुमने ? ये सब कबसे और बताया क्यों नहीं।  मैं मना थोड़े न करता।

शीला मदन के नजदीक जाकर उसका कॉलर सही करते हुए  कहती है।

शीला- अगर बता देती तो आपके चेहरे पर ये ख़ुशी कैसे ला पाती।  मैं जानती हूँ  तनख्वा चाहे कितनी भी हो, ढाई दिन से ज्यादा नहीं चलती है। जब आपको सेलेरी मिलती है, तो बड़ी  खुशी होती है। पर घर आते ही, कमरे का किराया, वन्दु के स्कूल की फीस, घर का राशन, सब्जी, दूध सब दो ढाई दिन में खत्म हो जाता है। और आपके लिए कुछ बचता ही नहीं।

मदन – हम्म सही कह रही  हो। मुझे माफ़ कर दो यार ! मेरे होते हुए तुम्हें ये सब करना पड़ रहा है।  घर में इतना काम करने के बाद भी तुमने ये सब।

शीला पलट कर अपने आंसू पोंछती है और फिर नकली हंसी के साथ कहती है.

शीला- मैंने सिलाई सिर्फ इसलिए शुरू की,  ताकि जो हमारी खुशी के लिए आप अपने अरमानों को दरकिनार कर देते हैं। उन अरमानों को मैं पूरा करूँ। अब से आप घर का खर्चा देखोगे, और मैं हम तीनों की ख्वाहिशें । 

दोनों एक दूसरे के गले लगते हैं, तो शीला कहती है। 
शीला- तनख्वा बेशक अब भी ढाई दिन की होगी। पर रकम पहले से थोड़ा ज्यादा। अगर अरमानों को मिलकर सिलेंगे तो ज़िन्दगी में कपड़ा कभी कम नहीं पड़ेगा।

समाप्त
हम सबकी ज़िंदगी में यही होता है। जब भी महीने की कमाई हाथ में आती है। उसके दो दिन बाद वो हमारे हाथ से चली भी जाती है।  कभी कभी तो पूरा महीना चलाने के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है। हर कोई अमीर भी नहीं होता है। कि, खर्च खत्म हो जाए तो तुरंत बैंक से निकाल ले। ऐसे लोग अपनी ख्वाहिशों को दरकिनार कर जैसे तैसे अपना जीवन बसर करते हैं। मेरी ये लघु कथा भी इसी पर आधारित है। पढ़कर मुझे कमेन्ट करके बताइएगा कि, आपको कैसी लगी। 

हंसते, मुस्कुराते, स्वस्थ रहिये। ज़िन्दगी यही है। 

आप मुझसे इस आईडी पर संपर्क कर सकते हैं.
sujatadevrari198@gmail.com

© सुजाता देवराड़ी





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