बैसाखी मेला

 बैसाखी का त्यौहार आने वाला  हैं। मगर हर साल की तरह, इस बार ये त्यौहार पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाना संभव नहीं है। क्योंकि देश एक बहुत बड़े संकट से जूझ रहा है। जिसके चलते, हर त्यौहार बस घरों में बैठकर मनाये जा रहे हैं। त्यौहारों पर जो रौनक होती थी, इस बार वो देखना दुर्लभ हो  गया है। समय की मांग को ध्यान में रखते हुए ये जरूरी भी है।  बैसाखी भी एक बहुत बड़ा त्यौहार है जिसमें हर साल अलग -अलग धर्म के लोग अपनी परम्पराओं के अनुसार ये उत्सव मनाने हैं। 

 आईए जानते हैं बैसाखी के विषय में 

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क्या है बैसाखी 

दीपावली और होली की तरह बैसाखी भी हर्ष और उल्लास का पर्व है। एक उत्सव है जो हर साल बैसाख माह की 13 या 14 तारीख को मनाया जाता है। बैसाखी का त्यौहार रबी फसल पकने की खुशी में मनाया जाता है। अप्रेल और बैसाखी का संबंध कुछ यूँ है कि, हिन्दू धर्म में अप्रेल माह को ही बैसाख कहा जाता है। इसी माह से शुभ और धर्म कार्यों की शुरुवात होती है। अप्रैल माह में रबी फसल (सरसों और गेहूँ ) कटकर घर आती है। इसी फसल को सब अपने ईश्वर को प्रथम भोग लगाकर इसे बेचकर किसान धन कमाते हैं। और अपने लिए सुख समृद्धि और खुशियाँ खरीदकर उसको अभिव्यक्त करते हैं। इसलिए भी बैसाखी का यह पर्व उल्लास का पर्व माना गया है। लेकिन जब बैसाखी में कुंभ का मेला भी हो तो इस दिन स्नान करने का महत्व और भी बढ़ जाता है। वहीं, दूसरी ओर यह त्यौहार सिख धर्म की स्थापना का भी प्रतीक है । इस दिन वैसाख माह की मेष संक्रांति भी होती है।

“पद्म पुराण में कहा गया है कि वैसाख माह में प्रात: स्‍नान का महत्‍व अश्‍वमेध यज्ञ के समान है। वैसाख शुक्‍ल सप्‍तमी को महर्षि जह्नु ने अपने दक्षिण कर्ण से गंगाजी को बाहर निकाला था। इसीलिए गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है। अत: सप्‍तमी को गंगाजी के पूजन का विधान है।”
यही नहीं, बैसाख माह में ही  13 अप्रैल साल 1699 के दिन सिख पंथ के 10वें गुरू श्री गुरू गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। पंजाब में विशेष रूप से मनाया जाने वाला यह पर्व भारत के अन्य राज्यों में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। खरीददारियाँ  की जाती हैं। घरों को साफ सुथरा किया जाता है। बड़े स्तर पर मेलों का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि, इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है।  सिख धर्म में वैशाखी को बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार माना गया है।

रिसर्च के अनुसार- 

बैसाखी के दिन रात होते ही आग जलाकर लोग उसके चारों तरफ एकत्र होते हैं और फसल कटने के बाद आए धन की खुशियाँ  मनाते हैं। नए अन्न को अग्नि को समर्पित किया जाता है और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है। गुरुद्वारों में अरदास के लिए श्रद्धालु जाते हैं। आनंदपुर साहिब में, जहाँ  खालसा पंथ की नींव रखी गई थी, विशेष अरदास और पूजा होती है। गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहब को सम्मान  पूर्वक बाहर लाकर दूध और जल से प्रतीक रूप से स्नान करवा कर गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर प्रतिष्ठित किया जाता है। इसके बाद पंच प्यारे ‘पंचबानी’ गायन करते हैं। अरदास के बाद गुरु जी को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है। प्रसाद भोग लगने के बाद सब भक्त ‘गुरु जी के लंगर’ में भोजन करते हैं।

 बैसाखी नाम कैसे पड़ा-
हर नाम का अपना इतिहास होता है। और उसके नामकरण का एक प्रमुख कारण। इसी तरह बैसाखी त्यौहार के नामकरण के पीछे भी एक छोटा सा रहस्य है। जिसकी वजह से ही बैसाखी नाम दुनिया भर में प्रसिद्ध हुआ।दसअसल माना जाता है, इस बात की पुष्टि मैंने अपने गाँव के किसी जानकार व्यक्ति से भी की है कि, बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है।  विशाखा नक्षत्र पूर्णिमा में होने के कारण इस माह को बैसाखी कहते हैं । कुल मिलाकर, वैशाख माह के पहले दिन को बैसाखी कहा गया है।  इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है

हिन्दू धर्म में बैसाखी का महत्व 

सिखों के लिए ही नहीं, हिंदुओं के लिए भी ये त्यौहार खास महत्व रखता है क्योंकि इसी महीने से हिन्दू नव वर्ष की शुरुवात होती है। और एक नये साल का आगमन कैसा होता है, ये तो हम सब जानते हैं। हालांकि इसमें अंग्रेजी केलेंडर के हिसाब से मनाये जाने वाले नये साल की तरह, पार्टियाँ  नहीं होती हैं। पर असली हिन्दू नव वर्ष का स्वागत कैसे होता है। ये बैसाखी का त्यौहार बताता है। मेलों की तैयारियों में सारा गाँव एकत्र होकर इस त्योहार को मनाता है।

कैसे मनाया जाता है, चमोली में बैसाखी उत्सव ?

मुझे याद है कि, बचपन में हमें भी बैसाखी मेले का बड़ी बेसब्री के साथ इंतज़ार होता था।  माँ इस दिन हमें यानि सारे भाई-बहनों को नए कपड़े खरीदकर लाती थी। घर में स्वादिष्ट पकवानों का चलन शुरू हो जाता था। दाल की पकौड़ियाँ, खीर,भरवे पूड़ी और पापा तो गोभी के पकौड़े अलग से बनाते थे। क्योंकि, उनको खाने का बहुत शौक़ था। साफ़ सफाई, खाना बनाना, और सबसे पहले नहाने की वो जल्दी, ताकि मेले के लिए देर न हो, ये एक अलग ही अनुभव होता था। हमारे  घर में जो पकवान बनाए जाते थे, उन्हें ननिहाल भी ले जाया जाता था, “ननिहाल को हमारी गढ़वाली भाषा में ममाकोट भी कहते हैं”। और वहाँ से वापसी के समय नानी जो डब्बा भरके खीर हमें देती थी, उसे हम भाई बहन दो दिन तक खाते थे। कभी -कभी तो मैं रास्ते में ही खीर को दोस्तों के साथ मिलकर चपट कर जाती थी। कुल मिलाकर रौनक की उत्सुकता अपने चरम पर होती थी।  कभी- कभी तो मैं दो दिन पहले ही अपने ननिहाल चली जाती थी। कभी अपने दोस्तों को लेकर जाती थी और कभी अकेले जाना होता था। मेले में खाने की बात हो या चरखे वाले झूले की, कोई भी एसी चीज ऐसी नहीं रहती जिसका आनंद उठाए बैगर मैं या कोई भी घर वापस आए।

चमोली में ‘कुलसारी’ एक जगह है, जहाँ बैसाखी का बहुत बड़ा मेला लगता था, आज भी लगता है। यहीं मेरा ननिहाल भी है।  यहीं आसपास  के गाँव के लोग श्रद्धा और उमंग के साथ मेले में आकर उसकी  रौनक में चार चाँद लगाते हैं। भारी मात्रा में दुकानें लगती हैं।   जहाँ खान पान, और खेल खिलोने सहित मनोरंजन की सारी सुविधाएँ  होती है।

कुलसारी से थोड़ा ऊपर खेतों के बीचों बीच नहर से होते हुए बसर गाँव का रास्ता पड़ता है। इसी  गाँव के बीच  एक बहुत बड़ा शिव मंदिर है।  ये मंदिर मेरी नानी के घर से बस दो घर छोड़कर आगे है।  इस मंदिर को आसपास के गाँव के लोग काफी मानते हैं । इस मंदिर के पुजारी मेरे नाना जी भी बहुत सालों तक रहे हैं। अब तो नाना जी भी नहीं रहे।

इसी शिव मंदिर से माँ भगवती को पूरे साज श्रृंगार के साथ तैयार करके बाहर आँगन में लाया जाता है। मंत्रोच्चारण और गीतों के साथ माँ भगवती के साथ-साथ  सभी देवी देवताओं का आव्हान किया जाता है। फिर मंदिर की परिक्रमा करके माँ भगवती को कुलसारी के मुख्य मंदिर में लाया जाता है। कुलसारी के मुख्य मंदिर के प्रांगण में “कालिंगा और नारायण ” दोनों ही मंदिर एक साथ हैं। इन मंदिरों का जिक्र नन्दा राज राजेश्वरी के प्रसिद्ध गीत में भी किया गया है। फिर पूजा अर्चना और भेंट के साथ सब लोग अपनी श्रद्धा  माँ को अर्पण कर, अपनी मनोकामनाओं की अरज माँ के सामने करते हैं।

माँ भगवती 
“कालिंगा,और नारायण मंदिर”
    
माँ भगवती कि पूजा अर्चना (गूगल का साभार)

 इस मेले में कई और स्थानों से भी माँ और सभी देवताओं  की निषाणे आती हैं। इन निषणों को ही देवी देवताओं के दूत कहा जाता है। जो कि देवी देवताओं के साथ उनके साथी बनकर चलते हैं । इन निषाणों को कुछ लोग हाथों में थाम कर रखते  हैं। इन निषाणों की एक ख़ास बात यह भी है कि, जो लोग इनको थामे रखते हैं ये उनके हाथ से खुद ही अपने भक्तों के ऊपर झुककर उनको आशीर्वाद देते हैं।

फिर माँ  सहित सभी निषाणों को मेले में घुमाकर पवित्र स्नान के लिए ले जाया जाता है।  सड़क के थोड़ा नीचे पिण्डर  नाम की नदी है। इसी नदी में  सबको स्नान कराया जाता है।

स्नान के बाद  इस भव्य मेले की शुरुआत होती है। ढोल,भंकोरों (ये एक तरह का पहाड़ी देव वाद्य यंत्र )बजाए जाते हैं।  (ये एक तरह का पहाड़ी देव वाद्य यंत्र )  इन वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनियाँ पूरे मेले को सुरमई बना देती है। इस मेले की रौनक भूले नहीं भुलाई जाती।

इस पिण्डर नदी के पास  एक बहुत बड़ा मैदान है। यहाँ पर अक्सर कई गाँवों के क्रिकेट मैच हुआ करते हैं। बैसाखी मेले के गोल चरखे भी इसी मैदान पर लगते हैं। मुझे आज भी  याद है एक बार इसी  मैदान पर पूर्व मुख्यमंत्री श्री भगत सिंह कोशियारी हवाई जहाज में बैठकर आए थे।  उनका जहाज इसी मैदान पर लैंड हुआ था। वो थराली और आसपास के सभी गाँवों के जन समुदाय को संबोधित करने आए थे। उस दिन सभी गाँवों के लोगों की जो भीड़ उमड़ी थी, वो देखते ही बनी थी। उस भीड़ के जमा होने के दो कारण थे -पहला तो ये कि, लोगों ने आज तक हवाई जहाज नहीं देखा था । तो उसको देखने की लालसा उनको यहाँ तक खींच लाई थी। और दूसरा ये कि- मुख्यमंत्री खुद लोगों को भाषण देने उनकी तकलीफों को जानने आए थे।

निसाणे को घुमाते हुए। (गूगल का साभार)
गंगा स्नान को जाते देव गण  (गूगल का साभार)

अब बात आती है कि, कुलसारी मेले तक पहुँचा कैसे जाता था । 

हमारे गाँव से कुलसारी मेले में जाने के दो रास्ते हैं । एक गाँव से पैदल रास्ता है और दूसरा गाड़ी का रास्ता।

जो पैदल रास्ता है वो जंगल से होते हुए जाता है । इसी मार्ग पर एक गाँव देवलग्वाड पड़ता हैं। इस रास्ते से मेले तक पहुँचने में एक से दो घंटे के बीच का समय लग जाता है। जो गाड़ी का रास्ता है जो थराली बाज़ार होते हुए जाता है।  इस रास्ते से मेले तक पहुँचने में लगभग आधा घंटा लग जाता है।

 मैं और मेरे गाँव के लोग अक्सर पैदल रास्ता ही चुनते थे, क्योंकि मेले के टाइम पर गाड़ियों की बड़ी मारामारी होती थी।  मैं तो पैदल रास्ते से इसलिए भी जाती थी क्योंकि मेले के लिए घर से खर्चा कम मिलता था और पैसे बचाने का मुझे यही उपाय सही लगता था। वैसे उस टाइम टेक्सी का ज़माना था यह टेक्सी चूंकि आकार में छोटी तो होती ही थी, इसलिए इसमें जगह भी कम होती थी। कई लोग तो पीछे लटककर भी  जाते थे।

जो पैदल रास्ता है उसके खत्म होते ही सामने नदी पड़ती है। जिसको पार करने के लिए लकड़ी का कच्चा पुल बनाया जाता है। ये पुल नदी के ऊपर हमेशा नहीं रहता है। बरसात शुरू होने से पहले ही  इसे उतार दिया जाता था। क्योंकि नदी के बढ़ते वेग से इसके बहने का खतरा रहता है।  इसी  पुल पर चढ़कर हम नदी को पार करते थे और फिर थोड़ा  सा ऊपर चढ़कर सड़क तक पहुँचते थे । इसी सड़क के बगल में एक दुकान थी। यही दुकान हमारा मीटिंग पॉइंट होती थी । यहीं पर हम अपने उन दोस्तों से मिलते थे, जो मेले के लिए गाड़ी से आ रहे  होते थे।  सभी दोस्तों से मिलकर वहाँ से पैदल सड़क ही सड़क तफरी मारते हुए मेले तक पहुँचते थे। हँसी मज़ाक वो समय काश वापस आ पाता। पर उनकी यादें ही बहुत खूबसूरत हैं जिनको याद करते ही चेहरे पर एक मुसुकुराहट अपने आप आ जाती है।

इस मेले के उपरान्त जहाँ -जहाँ से निषाणे बैसाखी मेले मे आई होती हैं , उन्हीं जगहों पर  फिर मेलों का आयोजन होता है। ये जगहें निम्न है:

चमोली में बैसाख में होने वाले मेले 

14 अप्रैल (1 गते बैशाख) : कुलसारी एवं पंती में
15 अप्रैल (2 गते बैशाख) : मींग में
16 अप्रैल (3 गते बैशाख) : खेनोली और कौब में
17 अप्रैल (4 गते बैशाख) : असेड़ कौथिग (असेड़ परखाल में)
18 अप्रैल (5 गते बैशाख) : मल्याल और हंसकोटी में

इस तरह के कई मेलों का भव्य आयोजन इसी बैसाख महीने में किया जाता  है।  इन सभी मेलों का अपना-अपना इतिहास है। इस उत्सव का अंतिम मेला 4 मई को कुँवारी देवी मंदिर परिसर आलकोट झिंझोली में  होता है।

भले ही बैसाखी को उत्तर भारत में गेहूँ की फसल की कटाई से जोड़कर देखा जाता है लेकिन माँ कहती है कि, पिंडर घाटी में इसे गेहूँ  की बालियों में अनाज के आने की खुशी और देव डोलियों के संगम स्नान के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गेहूँ की हरी बालियों को भूनकर इसे अखरोट की हरी-हरी पत्तियों में रखकर भगवान को भोग लगाने और परिवार जन में खिलाने की परंपरा  है। मुझे अच्छे  से याद है कि माँ भी ऐसा करती थी हम माँ को ज्यादा कच्चे गेहूँ भूनने को कहते थे। क्योंकि वो बड़े स्वादिष्ट होते  थे ।

बैसाखी का वो मेला सिर्फ मेला नहीं होता है, बल्कि एक मिलन समारोह होता है। खुशियाँ बाँटने  का एक धर्म स्थल होता है।  साल भर की थकान को सुकून में परिवर्तित करने का समय होता है। बच्चों के साथ बचपन जीने का समय होता है। एक अनोखा संगम होता है। इस मेले की छवि को अपनी यादों में बसाकर हर इंसान उसे हर साल याद करता है। जैसे आज मैं याद कर रही हूँ।  मुझे खुशी है कि, मैं पहाड़ में जन्मी हूँ  जहाँ हर साल संस्कृति से जुड़े हर त्योहार, मेले, रामलीला, कृषणालीला जैसे अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करके अपनी धरोहर को जागृत करने का हर संभव प्रयास किया जाता है। इन्हीं  प्रयासों में पले बढ़े होने का ही नतीजा है कि, मैं अपनी संस्कृति के विषय में आज कुछ लिख पाई हूँ। ज्यादा नहीं पर उन सँजोई हुई यादों को फिर से जीने मैं कामयाब हुई हूँ।  यही यादें जो  कभी बचपन और स्कूल के समय हमारी हमसफ़र हुआ करती थी।

तो ये थी मेरी बैसाखी की कहानी। उम्मीद है आपको पसंद आई होगी। और आप भी कहीं ना कहीं खुद को उन यादों में ले गए होंगें। अपनी यादें भी आप मुझसे साझा कर सकते हैं। आपके विचारों  का मैं हमेशा इंतज़ार करती हूँ । अपने विचारों और सुझावों से मुझे अवगत जरूर करवायें ।

हँसते, मुस्कुराते, स्वस्थ रहिये। ज़िन्दगी यही है। 

आप मुझसे इस आईडी पर संपर्क कर सकते हैं.
sujatadevrari198@gmail.com

© सुजाता देवराड़ी

3 Responses

  1. Manish Kumar says:

    चमोली में बैशाख मेले की आपकी यादें रुचिकर लगीं। खेती किसानी से जुड़े इस पर्व का उत्साह ग्रामीण अंचलों में रहने वाले ही भाली भांति व्यक्त कर सकते हैं। शहरों में तो इस अवसर पर ऐसी धूम नहीं होती।

  2. Manish Kumar says:

    "भाली" को "भली" पढ़ें।

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