बूँदें तो आख़िर बूँदें होती है.

बूँदें तो आख़िर बूँदें होती है.

क्या अजीब खेल है इन बूंदों का, कुछ

कभी बारिश बनकर, ज़मीं को हरा -भरा कर देती है ।
तो कभी आंसू बनकर आँखों को, सूखे बंज़र सी बना देती है । ।
बूँदें तो आख़िर बूँदें होती है ।
चाहे पानी बनकर, किसी की प्यास बुझा दे ।
चाहे आँखों से गिरकर, किसी की प्यास मिटा दे । ।
बूँदें तो आख़िर बूँदें होती है.

चाहे पानी की हो, बारिश की हो, या आंसुओं की। 
क्या अजीब खेल है इन बूंदों का भी ,
खुश होती है तो मोती, बनकर बिखर जाती है । 
बैचेनी के दर्द में ,जलते अंगार की तरह चुभन देती  हैं । । 
कभी खुद में, तस्वीर दिखाती है ये बूँदें । 
तो कभी आँखों में बसी, तस्वीर को भी धुंधला कर देती है । ।

कितनी कमाल की है ये बूँदें ।
जिन्हें अपना समय और सिचवेशन, सब पता  होती हैं ।
कभी सुबह की ओस बनकर, शीशे सी चमकती है ,
तो  कभी पिघलती बर्फ की तरह,  ख़ुद को ज़मीं में समेट  लेती है । ।
बड़ी अजीब होती है ये बूँदें
कभी दर्द बनकर साँसें छीन लेती है, तो कभी सुकून देकर हमदर्द बन जाती है।
क्या अजीब खेल है इन बूंदों का का।
हो भी क्यों ना , बूँदें तो आखिर बूँदें होती हैं । ।

ये  बूँदें हम सबकी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा होती हैं. ख़ुशी  ज़ाहिर करने और दर्द को हल्का करने में ये बूंदें ही हमारी साथी होती हैं.  मेरे साथ तो ऐसा होता है, क्या आप भी इन बूंदों से ख़ुद को जुड़ा हुआ सा महसूस करते हैं?   मुझे कमेंट करके जरूर बताइये.|  आपकी राय आपके सुझाव मेरा हौसला और बढ़ा देते हैं।

हँसते, मुस्कुराते, स्वस्थ रहिये। ज़िन्दगी यही है।  

आप मुझसे इस आईडी पर संपर्क कर सकते हैं.
sujatadevrari198@gmail.com


© सुजाता देवराड़ी

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