अनजाना सा एक चेहरा



अनजाना सा  एक चेहरा

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“पहली दफ़ा कुछ ऐसा हुआ, दिल ने एक चुगली दिमाग़ से की।
उस गली में कोई ख़ास नूर तो नहीं था, उस शीशे में खड़ी कोई हूर तो थी।।”

बस यही दो पंक्तियाँ उस दिन मेरे दिमाग में पूरी रात घूमने लगी। पिछले क़रीब एक हफ्ते से मेरा उस गली में आना-जाना रोज होने लगा। क्योंकि उसी रास्ते से मेरे ऑफिस का रास्ता गुजरता था । मेरी पहली जॉब थी तो अभी सारा ध्यान उसी पर था। कभी आस-पास इतना नोटिस ही नहीं किया। अचानक एक रोज 11 बजे ऑफिस निकलते समय मौसम ने करवट बदला, और मेरी नज़रों ने भी इधर- उधर ताक झांक करने का साहस कर लिया। क्योंकि बारिश से बचने के लिए एक कोना जो ढूँढना था। तभी नज़र  एक घर की खिड़की के शीशे पर पड़ी। बारिश से शीशा धुंधला पड़ा हुआ था, और मुझे सिर्फ एक परछाई सी उस शीशे में दिखी। कुछ देर मैं वहीं खड़ा देखता रहा कि, शायद वो परछाई उस धुंध को साफ करे.  मगर ऐसा कुछ भी न हुआ। गली की सड़क पानी में पूरी तरह डूबी हुई थी, फिर बारिश कुछ धीमी हुई और मेरे दिमामें भी ऑफिस कि देरी का खयाल दस्तक दे गया। मैं जैसे -तैसे ऑफिस के लिए निकल गया। 
शाम को जब में घर लौट रहा था तो, उस जगह पर मेरे कदम स्वतः (खुद) ही रुक गए । और मेरी नज़रों ने खुद ही उस शीशे कि तरफ देखना शुरू कर दिया। वो परछाई एक लड़की कि सूरत लिए अब भी वहीं खड़ी थी। शीशे पर पड़ती उसके कमरे की लाईट और बाहर लाईट की रौशनी से उसका चेहरा मुझे बिल्कुल साफ- साफ दिखाई दे रहा था। उस चेहरे को देख मेरी आंखे खुली कि खुली रह गईं । बेहद ख़ूबसूरत वो चेहरा, ऐसा था मानों खुदा ने तराश के ख़ूबसूरती तोहफे में उसे दी हो। ऐसा नहीं था कि इन आँखों ने आज से पहले खूबसूरती नहीं देखी थी, पर ऐसा नूर इन नज़रों ने पहली दफ़ा देखा।  मैं एक टक उसी चेहरे को देखता रह गया। भी एक बच्चा आकार मुझसे टकरा गया। और मेरी नजर जमीन पर झुक गई। मैंने उस बच्चे से कहा !

‘सॉरी बेटा आपको लगी तो नहीं’?

‘नहीं भैया मैं ठीक हूँ’। 

इतना कहकर वो बच्चा आगे चला गया. और मैंने फिर ऊपर देखा। तो कमरे कि लाईट बंद हो चुकी थी और शीशे से वो तस्वीर भी गायब हो गई थी। मैं हैरान था कि, पलक झपकते वो चेहरा कहाँ गुम हो गया। फिर मुस्कुराकर घर के लिए चल दिया ।
रात भर नींद ने आँखों में दस्तक क नहीं दी, क्योंकि वो चेहरा किसी को मेरे क़रीब आने ही नहीं दे रहा था। और दिमाग इस उलझन में परेशान था कि, सुबह से शाम वो लड़की उस शीशे के पास क्या कर रही थी। कौन थी वो”? आधी रात को बिस्तर से उठकर एक बार मन हुआ कि, फिर देखकर आऊँ वो चेहरा वहीं है या नहीं। पर फिर खुद को समझाया ।

“नहीं नहीं भार्गव तू पागल हो गया क्या?”

और चद्दर ओढ़ कर सुबह का इंतज़ार करने लगा।  अगली सुबह- मैं रोज कि अपेक्षा जल्दी घर से निकल गया। और उस घर के सामने एक दुकान में चाय पीने के बहाने से बैठ गया। सामने शीशे की तरफ देखते हुए मैंने अंकल से कहा !

“अंकल एक चाय बना दो”।

थोड़ी देर में अंकल चाय ले आए, और मैं घर की ही तरफ देखता रहा। चाय खत्म हो गई, और ऑफिस के लिए देर भी, पर वो चेहरा मुझे नर नहीं आया। मैं वहाँ से चल दिया। कई दिन इसी तरह बीते, यहाँ तक कि महीना बीत गया। मेरी हर सुबह हर रात उस चेहरे को ढूंढते हुए रह गई। आधी- आधी रात को उठकर मैं उस चेहरे को देखने जाता रहा। पर न जाने वो लड़की कहाँ गायब हो गई।
तभी मुझे एक दिन अंकल ने बताया कि,

“सिया बिटिया अब इस दुनिया में नहीं रही”।

ये सुनकर मैं चौंक गया। और मैंने घबराकर परेशान सा शीशे कि तरफ देखते हुए कहा , 

“अंकल ये सिया कौन है? और क्या हुआ था उसे”?

अंकल- बेटा उस शीशे में खड़ी जिस लड़की को तुम्हारी नरें दिन- रात खोजती थी। उसका नाम सिया           था।  सुबह से शाम उसी खिड़की में खड़ी होकर बाहर देखती रहती थी। लेकिन बाहर निकल   नहीं पाती थी।  

 “ऐसा क्यों” ?  मैंने सवाल के लहज़े में कहा

“बेचारी गूंगी थी।  और उसको अपने गूंगेपन से शर्मिंदगी होती थी, फिर वो इतनी सुन्दर थी कि, गली मोहल्ले के लड़के ही क्या ? कोई भी लड़का उसे देखकर अपनी नज़रें हटा नहीं पाता था.  और उसकी सुंदरता उसके माँ पापा के लिए तानों भरी परेशानी बन गई।  इसलिए वो बाहर नहीं निकलती थी”  

मैं ये सुनकर हैरान हो गया था।  

“पर वो खिड़की हमेशा बंद क्यों रहती थी? और अचानक उसकी——-मतलब ये सब कैसे? ”  रुक रुक कर मैंने परेशान होकर अंकल से पूछा। उस वक़्त लाखों सवाल मेरे मन को बैचेन किये जा रहे थे।  

“बेटा ! ये तो वही जाने!   पर हाँ  उसके पापा बता रहे थे की, उसे कैंसर ने जकड़ लिया था. और हमें इलाज का मौक़ा भी नहीं दिया। सबकुछ अचानक हुआ”।  इतना कहकर अंकल चाय बनाने लगे।  

ये सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। और आंखे नम! मेरी जुबां से सहसा निकल पड़ा 


“उसने  लोगों की नज़रों  से बचने के लिए, ख़ुद को कमरे में हमेशा के लिए क़ैद कर लिया था।  और आज़ाद भी हुई तो हमेशा के लिए”। 

इस बात ने मेरे दिल और दिमाग दोनों को झकझोड़ करके रख दिया। जुबान बहुत कुछ कहना चाहती थी, पर मानो वो चेहरा अपने साथ मुझसे मेरी जुबान भी चुरा ले गई थी। अब हर रोज वो शीशा तो दिखता है। मगर वो चेहरा नहीं। जिसे ये नज़रे आज भी देखना चाहती हैं।

                                                                       समाप्त
                                 
ये लघु कथा आपको कैसी लगी मुझे कमेंट करके जरूर बताइये।  ताकि मैं और अच्छा लिख सकूँ। और अपने विचारों  ख्यालों को आप सब तक पहुंचा सकूं।  आपकी राय आपके सुझाव मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं. 

 नोट- मेरी ये कहानी उत्तराँचल पत्रिका 2020 के दिसंबर अंक में भी प्रकाशित  हुई है।  

हँसते, मुस्कुराते, स्वस्थ रहिये। ज़िन्दगी यही है।  

आप मुझसे इस आईडी पर संपर्क कर सकते हैं.
sujatadevrari198@gmail.com


© सुजाता देवराड़ी


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