रिंगाल – Ringaal (Dwarf Bamboo)

रिंगाल

रिंगाल से बने उत्पाद

 

त्तराखंड के पहाड़ी गाँवों में ऐसी बहुत सी चीज़ें जैसे- विभिन्न प्रकार के वनस्पति, औषधियाँ, उपयोगी पेड़ पौधे, खनिज इत्यादि पाए जाते  हैं जिनसे हम परिचित तो होतें हैं पर दुनिया के बदलते तौर तरीकों को अपनाने की होड़ में हम सब उन चीजों से दूर होते जा रहे हैं। रंगीन प्लास्टिक के फर्नीचर्स हों या सामान रखने के लिए काँच के बर्तन। हमने इनको अपनी ज़िदगी का हिस्सा बना लिया है। पहाड़ के जंगलों में ऐसी कई तरह की लकड़ियाँ पाई जाती हैं जिनका इस्तेमाल कर हम इन चीजों से छुटकारा पा सकते हैं।

आप भी सोच रहें होंगे कि ये सब कहने का औचित्य क्या है ? इसका कारण मैं आपको  बताती हूँ।

प्लास्टिक के बहुतायत उपयोग से हमारी प्रकृति का संचालन और संतुलन दोनों बिगड़ते जा रहे हैं। इस चीज के  समाधान के लिए सरकार की तरफ से प्लास्टिक बंद कराने की कई मुहिम चलाई जा रही है।  बावज़ूद इसके इस मुहिम में सफलता हमें कहीं नजर नहीं आ रही है। जब हम प्लास्टिक की चीजों पर नियंत्रण करने की बात करते है तो पोलीथीन को बैन करके अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर देते हैं। जबकि हम सभी जानते हैं कि पोलीथीन के आलावा भी प्लास्टिक की चीजें कई तरह से हमारे जीवन में रच बस गयी हैं।

मेरा मानना है अगर हमें प्लास्टिक को अपनी ज़िंदगी से दूर करना है तो उसके लिए बहुत जरूरी है कि हम लोग अपने निजी जरूरतों के लिए प्लास्टिक की वस्तुओं के बजाय प्रकृति में मौजूद विकल्पों को देखें और उन्हें अपने इस्तेमाल के योग्य बनाएं। यह प्राकृतिक विकल्प न  केवल लोगों को रोजगार उत्पन्न करायेंगे बल्कि हमारे पर्यावरण के लिए भी यह लाभदायक होंगे। 

आज मैं आप लोगों के सामने एक ऐसे ही एक  प्राकृतिक विकल्प रिंगाल की चर्चा करूँगी। रिंगाल के विषय में बात करने से पहले हमारा ये जानना जरुरी है कि  रिंगाल आखिर है क्या? तो चलिये रिंगाल को विस्तृत रूप में जानने का प्रयत्न करते हैं। 

क्या है रिंगाल?

रिंगाल उत्तराखंड के जंगलों में पाया जाने वाला एक वृक्ष है। ये वृक्ष बाँस प्रजाति का है। बाँस और रिंगाल के बीच अंतर बस इतना है कि बाँस आकार में बहुत बड़ा होता है और रिंगाल थोड़ा छोटा।  रिंगाल  और बाँस की लकड़ियों की  बनावट और पत्तियाँ लगभग एक समान ही होती हैं। इसीलिए रिंगाल को बोना बाँस  (Dwarf Bamboo) भी कहा जाता है। जहाँ बाँस की लम्बाई 25-30 मीटर होती है वहीं रिंगाल 5-8 मीटर लंबा होता है। जहाँ रिंगाल 1000-7000 फ़ीट की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है क्योंकि रिंगाल को पानी और नमी की आवश्यकता ज्यादा रहती है वही बाँस सामान्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से पाया जाता है।

[Ringaal handcraft]

यह रिंगाल प्रकृति की मनुष्यों को दी हुई एक अनमोल भेंट सिद्ध हो रही है। कई तरह से इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। गाँवों में अब रिंगाल को एक व्यवसाय के रूप में देखा जा रहा है और इसको आगे बढ़ाने के लिए कई छोटी बड़ी मुहिमें  भी चलाई जा रही हैं।  चलिए जानते हैं इसका उपयोग कैसे किया जाता है।

रिंगाल रिंगाल के प्रकार 
जानकारी  अनुसार रिंगाल की 12 (बारह) उत्तराखण्डहोती है लेकिन उत्तराखण्ड में रिंगाल मुख्यतः  आठ  प्रकार के होते हैं।
रिंगाल की इन प्रजातियों में कुछ रिंगालों के  स्थानीय व वानस्पतिक नाम उपलब्ध हो पाए हैं  कुछ के नहीं । ये रिंगाल इस प्रकार हैं-

  • गोलू रिंगाल – (Drepanostachyum Falcatum)
  • देव रिंगाल- (Thamnocalamus Pathiflorus)
  • थाम -(ThamnocalamusJonsarensis)
  • सरुड़ू -(Arundineria Falcata)
  • भट्टपुत्रु यानि देशी रिंगाल 
  • मालिंगा रिंगाल
  • ग्यंवासू रिंगाल
  •  नलतरू रिंगाल

इन सबसे उत्तम प्रजाति का रिंगाल देव रिंगाल होता है

रिंगाल का उपयोग 

पहाड़ में कभी ना कभी जीवन यापन करने वाले लोगों का पाला रिंगाल और बाँस से बनी कलम से जरूर पड़ा होगा। इस कलम को पुराने लोग अपने लेखन कार्यों में इस्तेमाल करते थे।  मुझे अच्छे से याद है मैंने भी स्कूल समय में इस कलम का उपयोग किया था । स्कूल में परीक्षाएँ खत्म होने बाद हमारी टीचर हमें मिट्टी के बर्तन और लकड़ी से कुछ सजावट की वस्तुएँ बनाने के लिए कहती थी। मुझसे मिट्टी के बर्तन तो बन जाते थे पर लकड़ी से बस एक कलम और गुड़िया ही बन पाती थी।

रिंगाल का उपयोग करना जिन लोगों को आता है  वे लोग सूपा (दाल,चावल छाँटने और अनाज को साफ करने की वस्तु), फूलदेई की टोकरी सामान रखने की कंडी(बड़ी टोकरी), खाना रखने की डलिया (बर्तन), चंगेरा (अनाज रखने की वस्तु), झाड़ू, घास और गोबर धोने का सोल्टा (पीठ पर लादने वाली कंडी) आदि कई वस्तुएँ बनाते थे। रिंगाल से घर की छत तक बनाई जाती है। मॉर्डन पर्दे से लेकर घर की दीवारों  (वॉल) को भी रिंगाल की पतली लकड़ी से डिजाईन किया जा सकता है।  रिंगाल से की गई सजावट दिखने में काफी आकर्षक होती है।

देहरादून में मैंने भी कई ऐसे कॉफी शॉप और रेस्टोरेंट देखें हैं जहाँ सजावट के लिए रिंगाल का काम किया गया है। दून यूनिवर्सिटी कैंपस मोथरोवाला (Doon University Campus, Mothrowala, Dehradun, Uttarakhand) के पास रिंगाल नाम से एक कैफ़े है जिसकी पूरी सजावट रिंगाल की लकड़ियों से की गई है।  गूगल पर अगर आप रिंगाल सर्च करेंगे तो सबसे पहले इस कैफ़े का  ही नाम आता है ।  कैफ़े की पूरी जानकारी आपको यहीं मिल जाएगी।

एक बात  मैं यहाँ यह स्पष्ट करना चाहती हूँ कि, रिंगाल से बनी वस्तुएँ प्लास्टिक से न केवल अधिक मजबूत, टिकाऊ और  आकर्षक होती  हैं, साथ ही इनके कोई साईड इफेक्ट नहीं होते हैं और ना ही ये पर्यावरण को दूषित करते हैं। इन  वस्तुओं का इस्तेमाल करने के बाद जब ये खराब हो जाती हैं, तो आप इनकी लकड़ी को जलाकर सर्दियों का आनंद भी उठा सकते हैं या बगीचों की बाउंड्री पर आप इनको लगा सकते हैं।  रिंगाल हर तरह से सुरक्षा ही प्रदान करता है।

उत्तराखंड में रिंगाल जीवन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ वहाँ की कला को भी प्रदर्शित करता है। रिंगाल को उत्तराखंड में कई लोगों के रोजगार के रूप में भी देखा गया है। गरीब तबके के लोग हों या काश्तकार ये अपनी कला का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार के दिनचर्या में उपयोग होने वाली वस्तुएँ बनाकर बेचकर उससे अपनी आजीविका कमाते हैं।

ये वस्तुएँ  निम्न प्रकार की  हैं।

1. कंटेनर्स 
2. बास्केट्स  
3. डस्टबिन 
5. टूथपेस्ट स्टैंड 
6. फ्लावर पॉट (फूलदान)
7. लैंप 
8. सूटकेस 
9. बकेट्स 
10.प्लेट,पैन रैक,फाईल कवर और ट्रे इत्यादि 

रिंगाल से बने गहने

राजेन्द्र प्रसाद जी  अपने द्वारा बनाये गये रिंगाल के विभिन्न उत्पादों के साथ 



डलिया

डलिया



टोकरी



कंडी

रिंगाल की बनी कंडी



टोकरी

इन सब से हमें यह अंदाजा हो जाता है कि हमारी दिनचर्या में अधिकतम उपयोग की जाने वाली वस्तुएँ रिंगाल से बनाई जा सकती है। रिंगाल की सबसे अच्छी बात है, यह ईको फ़्रेंडली भी रहती है। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि  रिंगाल से ज्वेलरी तक बनती है। उत्तराखंड की कई संस्थाएं रिंगाल के रोजगार को बढ़ाने के लिए महिलाओं को इसकी ज्वेलरी बनाने का प्रशिक्षण दे रही हैं। जानकारी के मुताबिक ‘आगाज फेडरेशन’ ने चमोली जिले के पीपल कोटी और गरुड़ गंगा पाखी में आयोजित 15-15 दिन की कार्यशाला में रिंगाल की ज्वेलरी बनाने का प्रशिक्षण दिया है। आगाज ने ग्रामीण इलाकों में स्वरोजगार के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘हिमालयन इन्स्टिट्यूट फॉर स्किल डेवलपमेंट क्राफ्ट डिजाईन एवं लाईवली हुड’ की स्थापना की है।

रिंगाल के उपयोग के फायदे 

ग्रामीण इलाकों में अगर कोई रोजगार पनपता है तो उसका सीधा असर वहाँ के जनसमुदाय पर पड़ता है। अक्सर ग्रामीण इलाकों में रोजगार की कमी होने के कारण लोग शहरों की तरफ रुख करने लगते हैं। बढ़ती जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए जीवन यापन की आवशकताओं की पूर्ती के लिए  यह कदम उठाना गलत भी नहीं है। अपने सपनों को पूरा करने के लिए हर कोई भागता है। लेकिन अगर सपनों को पूरा करने का माध्यम गाँव में मिल जाये तो कोई क्यों अपने घरों से बाहर की तरफ भागेगा। रोजगार की संभावनाएँ घर में उपलब्ध होने से पलायन जैसी भयानक समस्या कभी हमारे सामने नहीं आएगी ।

पलायन को रोकने के लिए रिंगाल का उपयोग बेहद कारगर साबित हो सकता है। इसके लिए हमें  रिंगाल से बनी वस्तुओं के उपयोग को ना केवल प्रादेशिक स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ावा देने की बहुत आवश्यकता है। अगर ऐसा होता है तो न केवल हमारे गाँव विकसित होंगे बल्कि रिंगाल को रोजगार के रूप में बढ़ाने की सम्भावनाओं में भी बढ़ोत्तरी होगी।

इससे लोगों की कौशल कला में वृद्धि होगी। युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होने के साथ-साथ परिवार का सहयोग भी मिलेगा। उन्हें अपने परिवार को छोड़  दूर नहीं जाना पड़ेगा। उत्तराखंड हस्तकला उद्योग का विश्व भर में प्रचार-प्रसार होगा। प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण के लिए सरकार की तरफ से योजनाओं की माँग करके उसके कार्य क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा। यही नहीं रिंगाल के उपयोग से प्लास्टिक मुक्त प्रदेश बनाने का सपना भी साकार हो जाएगा जिससे हमारे पर्यावरण को बहुत फायदा होगा।

रिंगाल को हम सबके सहयोग की आवश्यकता है। 

दुनिया में हर छोटी या बड़ी चीज बिना सहयोग के आगे नहीं बढ़ती है। उसको आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी कोई ना कोई जरूर लेता है। कभी सफलता जल्दी मिल जाती है तो कभी लंबा इंतेज़ार करना पड़ता है। यही सहयोग हमें रिंगाल को बढ़ावा देने के लिए करना है। आज एक स्वस्थ,सुंदर और रोजगार युक्त उत्तराखंड बनाने के लिए हम सबको एकजुट होना बहुत जरूरी है। युवाओं का सहयोग रिंगाल के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि युवा पीढ़ी ही इसका भविष्य निर्धारित करेगी।

हमें ये बात सोचनी चाहिए कि रिंगाल की  इतनी उपयोगिता होने के बाद भी हम उसका उपयोग करने में असमर्थ क्यों हैं? प्रकृति ने हमें इतने उपयोगी संसाधन उपलब्ध कराए हैं लेकिन हम इनको छोड़ कर भेड़ चाल में चलकर अपने पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में क्यों लगे हैं?

इसका मुख्य कारण जो मुझे समझ आता है वह यह है कि प्लास्टिक और अन्य चीजों से बनी वस्तुओं के आगे रिंगाल से बनी वस्तुओं के खपत बहुत कम है। काफी कम लोग इनका उपयोग करते हैं। इस कारण  काश्तकारों की आय उतनी नहीं हो पाती है जिससे वह एक अच्छा जीवन जी सके। चूँकि आय कम है तो युवाओं को भी यह रोजगार इतना आकर्षित नहीं कर पाता है।

रिंगाल को रोजगार के रूप में बढ़ावा देने के लिए हम सबको मिलकर कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे।

  • हमें सरकार से आग्रह करना चाहिए कि रिंगाल के निशुल्क प्रशिक्षण के कैंप लगाए जाएँ । ताकि लोग अधिक संख्या में जाकर इसका लाभ उठा सकें । 
  • विभिन्न योजनाओं के तहत रिंगाल से बने वस्तुओं के खरीद की प्रदर्शनी लगाई जाएँ। 
  • रिंगाल को जन समुदायों के सम्बोधनों में शामिल किया जाना चाहिए। ताकि लोगों को इसकी जानकारी मिल सके। 
  • रिंगाल सामग्रियों के  प्रचार-प्रसार के लिए सरकार और विभिन्न संस्थाओं को साथ मिलकर काम करना चाहिए। 
  • रिंगाल से  बने वस्तुओं के फ़ायदों को अपने संदेशों के जरिए भी बताकर हम इसे बढ़ावा दे सकते हैं। 
  • रिंगाल की  वस्तुओं का उपयोग करने के बेहतर तरीके हम सोशल मीडिया के जरिए भी बता सकते हैं। इसका फायदा ये होगा कि रिंगाल से अनभिज्ञ व्यक्तियों को भी इसकी जानकारी आसानी से प्राप्त हो सकेगी और वो इसका लाभ ले सकेंगे। 
  • रिंगाल की सार्वजनिक वेबसाइट या मोबाईल पर ऐप्स बनाकर उसकी वस्तुओं का प्रचार किया जाना चाहिए। ताकि लोग इसका अधिक से अधिक उपयोग करें। 
  • घरों के नजदीक रिंगाल की नर्सरी लगाई जानी चाहिए। 
  • उत्तराखंड सरकार को स्वयं आगे बढ़कर रिंगाल को लघु उद्योग से उठाकर एक वृहद उद्योग में तब्दील करने की पहल करनी होगी । 
  • रिंगाल को प्रतियोगिताओं में शामिल कर बच्चों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ी इसके महत्व को समझकर भविष्य में इसका सही उपयोग करने में सफलता प्राप्त कर सके। 

निष्कर्ष

जिस तरह रिंगाल को हम सबकी जरूरत है। उसी तरह हमारे स्वस्थ और सुंदर भविष्य के लिए हमें भी रिंगाल की उतनी ही या यूँ कह लीजिए उससे कई ज्यादा आवश्यकता है। तो आईये हम सब मिलकर ये संकल्प करते हैं कि रिंगाल से बनी वस्तुओं का अपने दैनिक जीवन में अधिक से अधिक उपयोग करें। जिन दामों में हम प्लास्टिक या काँच की  बनी वस्तुओं को खरीदते हैं उन्हीं दामों में हम रिंगाल की वस्तुओं को भी खरीदकर काश्तकारों को एक उचित आय प्रदान करने में सफलता प्राप्त कर सकें। मौक़ा मिलने पर रिंगाल प्रशिक्षण का हिस्सा बनकर उसकी महत्ता को जानने का प्रयत्न अवश्य करें। प्रदर्शनियों के लिए अपने आसपास बात करें, माहौल बनायें ताकि रिंगाल का प्रचार प्रसार करने में आसानी हो। घर की सजावट के लिए रिंगाल के डिजाईनों का प्रयोग करें जिससे घर में आने वाले व्यक्तियों को इसकी जानकारी मिल सके। सोशल मीडिया को भी हम रिंगाल के प्रचार प्रसार के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। उत्तराखंड को विकसित करने में हमें ही एक दूसरे का सहयोग करना है।

मुझे उम्मीद है आपको रिंगाल का ये लेख पसंद आया होगा और आप भी इस लेख को औरों तक पहुँचाकर उन्हें भी जागृत करने में मेरा सहयोग करेंगे। अपनी राय, अपने सुझावों को कमेन्ट के जरिए आप मुझसे साझा कर सकते हैं।

हँसते, मुस्कुराते, स्वस्थ रहिये। ज़िन्दगी यही है। 
आप मुझसे इस आईडी पर संपर्क कर सकते हैं.
sujatadevrari198@gmail.com
© सुजाता देवराड़ी

 

3 Responses

  1. Jaggu bhandari says:

    वाह बहुत खूब सुजाता जी,
    बहुत बढ़िया वर्णन किया है आपने

  1. 13 May 2020

    […] दिनों पहले मैंने रिंगाल पर एक पोस्ट साझा की थी जिसमें मैंने […]

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