वो याद पुराना मौसम आया

वो याद पुराना मौसम आया - सुजाता देवराड़ी नैनवाल
वो याद पुराना मौसम आया - सुजाता देवराड़ी नैनवाल

कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है कि कोई ऐसी याद जेहन में वापस तरोताज़ा हो जाती है जिसे हम वक़्त की रफ़्तार में कहीं भूल से गए होते हैं। कोई फोटो, कोई खुशबू, कोई गीत या कोई चित्र हमसे यूँ रूबरू हो जाता है कि वह हमारा हाथ पकड़कर कुछ समय के लिए ही सही हमें फिर उस बीते वक़्त में ले जाता है, जहाँ से शायद हम काफी दूर चले आये थे।

फेसबुक का मेमोरी फीचर भी ऐसा ही एक माध्यम रहा है। वह कभी कभी कुछ ऐसा आपके सामने ले आता है और आप खुशी से यूँ भर उठते हो जैसे आपको कोई पुरानाr खोया खजाना मिल गया हो।

ऐसी ही एक तस्वीर फेसबुक ने हाल में मुझसे साझा की है।

पुरानी याद
पुरानी याद

इस तस्वीर के पीछे भी बहुत लम्बी कहानी है। पूरी कहानी तो नहीं लिख सकती यहाँ पर कुछ इससे जुड़ी बातें है जिन्हें याद करके हँसी भी आती है अपनी नादानी पर और आँखें भी नम हो जाती है इन यादों को वापस अपने करीब पाकर।

ये तस्वीर लगभग 2014 की है। मेरे पास एक कैमरा वाला फोन पहली दफा आया था। अपनी बात करूँ तो ये मेरे लिए बड़ी घटना थी क्योंकि फोटो खिंचाने का शौक मुझे बहुत था लेकिन ये स्टूडियो में जाने पर ही संभव हो पाता जिसका मौका कम ही लगता था। इसलिए इस फ़ोन को देखकर उस समय ऐसा लगा जैसे छोटा स्टूडियो मेरे हाथ में ही आ गया। जिससे जब चाहे फ़ोटो ली जा सकती है और जिसमें इन खिंची हुई फोटों को जब चाहे देख सकते हैं।

इन तस्वीरों को खींचते समय मैं ज्यादा सोचा भी नहीं करती थी। न एंगल की चिंता होती, न पोज़ की, बस शर्म होती थी कि कोई देखे न मुझे। और कपड़े तो मैं ऐसे पहनती थी जैसे स्टूडियो ही फ़ोटो खींचने जाना हो।

उन दिनों फ़ोन पर न कोई फिल्टर होता था, न कोई ऐप जिससे तस्वीर साफ की जा सके और मेकअप की जानकारी तो बिलकुल नहीं थी। लिपस्टिक भी मेरे पास एक ही होती थी। कभी-कभी तो मैं सरसों का तेल होंठो पर लगा कर कुछ देर के लिए होंठों को चमका देती थी। और ऐसा लगता था कि होंठो पर लिप ग्लॉस लगाया हो।

उस समय फोन में न कैमरा उतना साफ होता था और न फ़ोन से सेल्फी लेने की ही मुझे कोई आदत थी। यहाँ तक फ़ोन भी बराबर ढंग से पकड़ना मुझे नहीं आता था। आम चीजें नहीं आती थी तो मोबाइल फोटोग्राफी से संबंधित बारीकियों की बात सोची भी नहीं जा सकती।

मगर उस तस्वीर को देखकर जो तसल्ली और सुकून मिलता था न, उसे बयाँ करना आज बहुत मुश्किल है। एक मासूमियत सी थी मुझमें। बचपना ही कह लीजिए। पर बचपना भी तो अनमोल होता है।

अभी भी यह सब लिखते वक्त मेरे ज़ेहन में वो पल वापस हलचल मचा गया और एक हल्की सी मुस्कान मेरे लबों पर उकेर गया।

यादों का एक पिटारा खुला, जिसने सुबह-सुबह मुझे 13 साल पुरानी सुजाता से वापस मिलवा दिया।

Leave a Reply

%d bloggers like this: