यादें -ऋषि कपूर की – अलविदा Rishi Kapoor

यादें -ऋषि कपूर की - अलविदा Rishi Kapoor
यादें -ऋषि कपूर की - अलविदा Rishi Kapoor

ज़िंदगी का खेल कभी -कभी समझ के परे होता है जो ना सुख का हिस्सा होता है ना दुख का। 

लोग कहते हैं कि तू अब चल बसा। 

मैं कहती हूँ तू रच बस गया। 

नज़रों से दूरी का ग़म नहीं कोई। 

तेरी याद सितारा बन आँखों में चमक रहा ।  

ज़िंदगी का खेल कभी-कभी समझ के परे होता है जो ना सुख का हिस्सा होता है ना दुख का,  बस अफ़सोस के ही इर्द गिर्द चक्कर लगाता है। कभी लगता है ये ज़िंदगी वाक़ई में दो दिन का खेल है जिसमें इंसान अपने हिस्से का अभिनय करके चला जाता है। रह जाती है तो सिर्फ यादें। 

एक महान कलाकार आज अपनी ज़िंदगी का खेल पूरा कर चल बसा। जो रौनक यहाँ उन्होंने बिखेरी थी वो रौनक बस आँसुओं में तब्दील होकर भावनाओं के जरिए बहती जा रही है। शब्दों की निशब्दता ये जाहिर कर रही है कि ये दुख असहनीय है। एक बहुत बड़ी क्षति हुई है कपूर खानदान को और सिनेमा जगत को जिसे भरना असंभव है। 

जी हाँ, मशहूर दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता  ऋषि कपूर का बीती रात निधन हो गया है। बॉलीवुड के महान कलाकार और एक बहुत अच्छे इंसान ऋषि कपूर की ज़िंदगी का सफर अब खत्म हो गया। कपूर फैमिली से रणधीर कपूर ने ऋषि के निधन की खबर को कंफर्म किया है । ऋषि कपूर काफी लंबे समय से केंसर से जूझ रहे थे लेकिन अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें  बुधवार उनके परिवार ने एच.  एन.  रिलायंस अस्पताल में भर्ती कराया था । डॉक्टर्स की काफी कोशिशों के बाद भी उन्होंने हम सबको अलविदा कह दिया। उनके भाई रणधीर ने बताया था कि उन्हें सांस लेने में समस्या हो रही थी । 

 29 अप्रैल को हिंदी सिनेमा ने एक्टर इरफान खान को खोया था । अब इरफान के निधन के 1 दिन बाद 30 अप्रैल को ऋषि कपूर अलविदा कह गए। बैक टू बैक दो दिग्गज अभिनेताओं को गवाँ देना फिल्म इंडस्ट्री के लिए बहुत बड़ा झटका है ।  ऋषि कपूर के निधन से देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी है । सोशल मीडिया पर सेलेब्स और फैंस एक्टर के निधन पर शोक जता रहे हैं। 

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होगा तुमसे प्यारा कौन 

तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती नज़ारे हम क्या देखें, 

क्या हुआ तेरा वादा वो कसम वो इरादा। 

आज उनके निधन की खबर सुनकर मुझे उनके  ये गीत याद आ रहे हैं । इन्हीं गीतों से ऋषि जी ने हम सबके दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। 

4 सितम्बर के दिन 1952 में बम्बई मैं जन्में  ऋषि कपूर स्‍वर्गीय श्री राज कपूर के बेटे और प्रूथ्‍वीराज कपूर के पोते है। परम्‍परा के अनुसार उन्‍होने भी अपने दादा और पिता के नक्‍शे कदम पर चलते  हुए फिल्‍मों में अभिनय करना आरम्भ किया ,और वे एक सफल अभिनेता के रूप में उभर आए। ‘मेरा नाम जोकर’ यह उनकी पहली फिल्‍म थी जिसमें उन्‍होने अपने पिता के बचपन का किरदार निभाया था जो किशोर अवस्‍था में अपने टीचर से ही प्‍यार करने लगता है। फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए जब ऋषि कपूर जी का नाम फ़ाइनल किया जा रहा था, तब हमारे चिंटू जी अकेले अपने कमरे में ओटोग्राफ़ देने की प्रैक्टिस किया करते थे क्योंकि वो जानते थे कि इस फिल्म के बाद वो बन जायेंगे एक सुपर स्टार । हुआ भी एसा ही उन्हें फिल्म ‘मेरा नाम जोकर‘ के लिए बेस्ट चाइल्ड एक्टर का नेशनल अवार्ड मिल गया जो की इनकी लाइफ का सबसे बड़ा और पहला अवार्ड था । ये बात भी बहुत कम लोगों को पता है कि  1970 की फिल्म ‘श्री 420’ में ऋषि साहब पहली बार फिल्मों में नज़र आये थे।  इस फिल्म का गाना “प्यार हुआ इकरार हुआ”  इसमें ऋषि कपूर अपने भाई बहनों के साथ नज़र आते हैं। इनकी उम्र तब मात्र 2 साल की थी ।  

1973 मैं आई फिल्म ‘बॉबी’, जिसमें ऋषि कपूर और डिम्पल कपाडिया एक साथ नज़र आए थे,ऋषि कपूर की बतौर मुख्य अभिनेता ये पहली फिल्म थी। इस फिल्म में दोनों के टीनएज रोमांस ने सभी का दिल जीत लिया। ऋषि जी ने बतोर लीड एक्टर इस फिल्म से ये साबित कर दिया कि वो अपने दम पर भी अपनी फिल्म को सफल बना सकते हैं । इनके पिता  राज साहब को भी इनकी एक्टिंग का लोहा मानना पड़ा । फिल्म बॉबी से ये बात साफ़ हो गयी थी कि एक ऐसा सितारा सिल्वर स्क्रीन पर आ गया है जो नाच सकता है,एक्टिंग कर सकता है रोमांस कर सकता है और कॉमेडी भी कर सकता है।

ऋषि कपूर की अभिनय क्षमता ऐसी रही मानो हर किरदार के लिए इनको बनाया गया हो। जैसे कोई साधु अपनी भक्ति में रम जाता है वैसे ही ये अपने अभिनय में रम जाते थे। गानों की भी मैं बात करूँ तो हर गीत इनके लिए बनाया गया लगता था। कोई भी गीत हो ऋषि कपूर की अदाकारी उस गीत में फिट हो जाती थी ।  गानों में चाहे वेस्टन हो, क़व्वाली हो रोमांटिक हो या फिर दर्द भरा हर गीत इनमें रच बस जाता था। सभी तरह के गीतों में इनका अंदाज बेजोड़ बे-मिसाल रहा है। 

फिल्म ‘कर्ज’ का “मेरी उमर के नौजवानों”, दर्द -ए -दिल दर्द-ए-ज़िगर  फिल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ का “बचना ऐ हसीनों”, फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ का “पर्दा है पर्दा पर्दे के पीछे, पर्दा नशी है”, फिल्म “बॉबी” का “हम तुम एक कमरे में बंद  हों” , फिल्म ‘खेल खेल’ का “एक मैं और एक तू, खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों” , फिल्म ‘जहरीला इंसान’ का “ओ हंसनी”, फिल्म ‘बड़े दिल वाला’ का “कहीं न जा आज कहीं मत जा फिर मिले ना मिले ये पल ये समाँ” । ये गीत सदाबहार हिट थे। आज भी लोगों की ज़बाँ ये गीत भूले नहीं हैं। आहा! क्या गीत थे क्या अंदाज़ था, क्या बाखूबी ऋषि कपूर ने इन गीतों में अभिनय कर इन्हें एक नया मोड़ दिया था। आज इन गीतों को सुनकर इन्हें याद कर असहाय ही उनका चेहरा आँखों के सामने आकर आँखें को नम कर रहा है। साथ ही चेहरे पर एक खुशी मुस्कुराहट के साथ बिखर रही है क्योंकि वो एक चमकते सितारे की तरह थे जिनके नाम से मन खिलखिलाने लगता है। 

मैं बात करूँ अगर इनके लुक की  तो हर लुक में ऋषि जी इतने स्मार्ट लगते थे कि हर लड़की उनपर अपना दिल हार जाती थी। जवान दिलों की धड़कन तो वो थे ही, साथ ही इनकी स्मार्टनेस का भी कोई जवाब नहीं था। यूँ  ही नहीं लड़कियाँ अपने चिंटू जी पे मरती थी। उनका एक अंदाज़ बहुत मशहूर हुआ था डफ़ली बजाना। जब डफ़ली बजा कर ऋषि कपूर पर्दे पर उतरते थे तो पूरा सिनेमा हॉल सीटियों से गूँज जाता था। फिल्म ‘सरगम’ का वो गीत ‘डफ़ली वाले डफ़ली बजा’ जिस मासूमियत से चेहरे पर मुस्कुराहट लिए ऋषि जी इस गीत में डफ़ली बजाकर गाते हैं, जया पर्दा के लिए वो इज़हार-ए- मोहब्बत आज भी भुलाये नहीं भूलती है। डफ़ली का वो अनोखा अंदाज़ जया पर्दा को भी झूमने पर मजबूर कर गया था । जब कभी ऋषि जी किसी रियलिटी शो में जाते थे तो उनके फैंस उनसे डफ़ली बजाने की फरमाइशें किया करते थे। 

दोस्ती हर किसी की लाइफ में बहुत ख़ास होती है। अपने ऋषि जी के लिए भी किसी की दोस्ती बहुत ख़ास थी वो थे, पंचम दा यानी आर.डी बर्मन साहब । आपको शायद मालूम नहीं होगा कि  ऋषि जी ने सबसे ज्यादा काम पंचम दा के साथ किया है । इन दोनों ने लगभग 17 फ़िल्में एक साथ की है । ऋषि जी ने ये बात एक इंटरव्यू मैं कही थी कि पंचम दा इन्हें बहुत अछा मानते थे और पंचम जी का जितना भी जवान म्यूजिक था वो सब ऋषि जी के साथ था । इनसे जुड़ी एक और दिलचस्प बात ये है कि ऋषि जी ने कभी गाना नहीं गाया क्योंकि वो खुद कहते हैं कि वो इतना बेसुरा गाते हैं कि सामने जो हिरोइन होती थी वो डर जाती थी। 

राज कपूर साहब ने बॉबी की सफलता के बाद अपने बेटे ऋषि के साथ एक और फिल्म बनाई 1982 में “प्रेम रोग” । इस फिल्म में पद्मिनी कोल्हापुरी ऋषि जी के अपोजिट थी । इसमें इन्होंने देवधर नाम का एक बहुत ही संजीदा किरदार निभाया जो अपने प्यार को पाने के लिए हर हद को पार कर देता है।  फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और ऋषि जी को फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर के लिए नोमिनेट किया गया। इस फिल्म का प्यार के रंग में डूबा हुआ एक बहुत ही अच्छा डायलॉग है जिसे सुनकर उनके प्यार में डूबने का मन होता है।

‘क्यों कोई एक, सिर्फ एक ऐसा होता है, जो इतना प्यारा लगने लगता है कि अगर उसके लिए जान भी देनी पड़े तो हँसते- हँसते  दी जा सकती है” प्यार को परिभाषित करने का ये अंदाज़ हमेशा उनकी याद दिलाएगा। 

ऋषि कपूर की एक और जबरदस्त फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर एंट्री ली वो फिल्म थी “सागर”इसमें  बॉबी की को-स्टार डिम्पल कपाड़िया इनके साथ पूरे 12 साल बाद नज़र आई। इस जोड़ी को एक बार फिर दर्शकों ने बॉबी की तरह ही खूब पसंद किया । हिट फिल्में देने का ये सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रही थी और इसके  बाद ऋषि जी की सबसे यादगार फिल्म “चांदनी” ने बॉक्स ऑफिस पर आकार सारे रिकार्ड तोड़ दिए । ये एक म्यूजिकल फिल्म थी जिसके गीतों ने पहले ही हफ्ते धूम मचा दी थी। इस फिल्म को बेस्ट फिल्म का नेशनल अवार्ड भी मिला था । फिल्म में श्री देवी जी ने इनके साथ काम किया था जो इससे पहले भी ऋषि जी के साथ फिल्म नगीना मैं काम कर चुकी थी। अफसोस की दोनों ही दिग्गज कलाकार अब हमारे बीच नहीं रहे।

“तेरे मेरे होंठों पे प्यारे-प्यारे गीत मितवा” फिल्म चाँदनी का ये गीत ऋषि जी के साथ छोड़ गया एक अनोखी याद। उनके ये गीत हम सबके होंठों पर हमेशा मुसकुराते रहेंगे।  

ऋषि जी एक मात्र एसे एक्टर रहें हैं जिन्होंने पुरानी और नयी दोनों हिरोइन्स के साथ काम किया किया है । इनकी जोड़ी किसी के साथ भी जम जाती थी और हिट भी हो जाती थी। बॉलीवुड मैं एसा कोई दूसरा एक्टर नहीं है जिन्होंने अपने से कई कम उम्र वाली हिरोइन्स के साथ काम किया है। अपने परिवार में भी ये एक अकेले ऐसे एक्टर हैं जिन्होंने अपने पापा राज कपूर, अपने भाई रंधीर कपूर और अपने चाचा शशि कपूर तीनों के साथ काम किया है।  90’s तक आते -आते इनकी कई ऐसी फ़िल्में आई जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर कई रिकार्ड कायम किये। ऋषि जी ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि किसी किरदार को निभाने के लिए उम्र की जरुरत नहीं होती है बल्कि हुनर और जज़्बा होना चाहिए।  फिल्म याराना, हिना, दरार और दीवाना ये इनकी ऐसी फ़िल्में थी जिन्होंने अपने ऋषि जी की रोमेंटिक इमेज को हमेशा कायम रखा था। 

‘दीवाना’ फिल्म में खूबसूरत दिव्या भारती के प्यार में दीवाने हुए ऋषि कपूर और उस पर ये गाना “तेरी इसी अदा पे सनम हमको तो प्यार आया” सच इस फिल्म के रवि यानि ऋषि कपूर की अदाओं पर प्यार ऐसे उमड़ता था मानो बिन बादल के बरसात हो चली हो। 

ऋषि जी हम हमेशा आपकी उम्मीद और आपका इंतजार आपके गीतों आपकी फिल्मों आपके किरदारों में करते रहेंगे। 

तू ना सनम है, ना इश्क़ है, ना खुदा है ना ही कोई मरहम है। 

फिर भी वफ़ा-ए इश्क़ ये दिल तुमपे आज भी मरता है । 

कुछ लोग कुछ ना होकर भी हमें ज़िंदगी जीना सिखा  जाते हैं। ऋषि कपूर ने भी हर फिल्म से ज़िन्दगी जीने का एक तरीका अपने फैंस को सिखाया है। उनके लिए कुछ लाईनें मुझे याद आ रही कि-

“फर्क ये नहीं पड़ता कि वो शख़्स हक़ीकत है या सपना।

फर्क ये  पड़ता है कि उसके आने से हम गहरी नींद से उठ जाते हैं”।।

कभी-कभी ऊपर वाले के फैसले के आगे हमें झुकना ही पड़ता है, दिल वो फैसला मानने को तैयार नहीं होता है पर हमारा आने वाला कल उस फैसले के बाद हमारी ज़िंदगी ही बदल देता है। कभी खुशियाँ आँगन में दस्तक दे जाती है कभी पछतावे की लकीरे हमारे माथे पर सदा के लिए गढ़ जाती है। वक़्त से बड़ा बलवान इस धरती अम्बर पर कहीं नहीं है उसके आगे नतमस्तक होने के सिवाय हमारे हाथ में कुछ नहीं है। इसी वक़्त के आगे ऋषि जी भी नतमस्तक होकर हमसे बिन बताए दूर हो गए। 

हर इश्क का एक वक्त होता है, वो हमारा वक्त नहीं था, पर इसका ये मतलब नहीं कि वो इश्क नहीं था” फिल्म जब तक है जान का ये डायलॉग उनको हमेशा अमर बना  गया।

फिल्म फ़ना का ये डायलॉग मुझे आज भी याद है। “हम आज जो फैसला करते है, वही हमारे कल का फैसला करेगा” एक दमदार आवाज़ ने इस डायलॉग को हमेशा के जीवित कर दिया है।  उनकी आवाज़ की भरपाई अब सिनेमा जगत में कोई नहीं कर सकता है। 

ऋषि जी ने अपनी कामयाबी का श्रेय कभी अकेले खुद को नहीं दिया। उनका मानना था कि उनकी कामयाबी के पीछे उनके डायरेक्टर, प्रोडूसर और म्यूजिक का भी उतना ही हाथ है जितना कि उनका था। उतार चढ़ाव तो हर किसी की जिंदगी मैं होते है मगर हार मान लेना कभी सोलूशन नहीं होता है। उनके इसी जज़्बे ने उन्हें आखरी दम तक फिल्मों में काम करने की प्रेरणा दी है । इनकी मेहनत को लोग आज भी अपनी फिल्मों में देखना चाहते थे। अभी तो बहुत काम बाकी था, बहुत बातें बाकी थी लेकिन समय नाम की घड़ी ने इनकी साँसों में चलना रोक दिया । उनके जज्बे को मैं सलाम करती हूँ। 

तू खास है नवाब है, किरदार तुझमें बे हिसाब है। 

कल सितारा बनके उभरा था, आज खिला चाँद है। 

सूरज भले ही ढल गया, तू रूप बनके छुप गया। 

तू साथ है सदा यहीं, ये बात खुद ही  कह गया। 

ऋषि जी आपके जाने से जो क्षति आपके फैंस, आपके दोस्त, आपके परिवार और पूरे सिनेमा जगत को हुई है उसे कभी कोई भर तो नहीं सकता है, लेकिन आपसे जुड़ी हर याद, आपके निभाए हर किरदार, हर गीत जो आपकी जुबाँ पर खिलने लगते थे वो अजर-अमर है।  इन सब में आप हमेशा के लिए ज़िंदा हो। एक चॉकलेटी बॉय के रूप में आपका चेहरा, वहीं रंग बिरंगी स्वेटर्स जो आपकी पहचान हुआ करती थी हर वो चीज जो आपसे जुड़ी हुई थी वो कभी हमसे दूर नहीं हो सकती है। आपका जाना बेहद दुखद है। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

3 Responses

  1. Poonam Rawat says:

    nice lines

  2. बहुत ही अच्छा लेख है एक असाधारण रूप से प्रतिभाशाली कलाकार पर जो जवां दिलों की धड़कन था । ‘श्री 420’ का प्रदर्शन वर्ष 1955 था । ऋषि कपूर की तीसरी सालगिरह के दो दिन बाद 6 सितम्बर, 1955 को यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी । वैसे मानना होगा कि इस विस्तृत लेख का शब्द-शब्द ऋषि जी के एक सच्चे मुरीद की झलक देता है ।

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