यादों का कैपसूल

यादों का कैप्सूल -सुजाता देवराड़ी

यादें भी कितनी पागल होती है न! बिन बताए आ जाती है। समय नहीं देखती, बस टपक पड़ती हैं। दरवाजा नॉक किये बिना ज़ेहन में आ जाती हैं। दिमाग़ के दरवाजे से होकर चुपके से दिल के सोफे में आकर बैठ जाती है ये यादें। इन्हें बस बहाना चाहिए होता है आने का। जैसे आज बहाना बनी ये तस्वीर:

यादों का कैप्सूल
बहन की भेजी तस्वीर

कल फ़ोन को साइड में रखकर आराम कर रही थी कि मेरी बड़ी दिदी का मैसेज व्हाट्सएप पर आया। मेरी तबीयत कुछ दिनों से खराब चल रही थी। जाहिर है मुझे लगा तबीयत पूछने के लिए मैसेज किया होगा। मैंने रिप्लाय करने के लिए फ़ोन उठाया तो ये तस्वीर वहाँ छुप कर बैठी थी। दीदी ने ये कोलाज बनाकर मुझे भेजा था। वो ये काम अक्सर करती हैं। हमारी तस्वीरों के कोलाज बनाकर हमें भेजती रहती हैं। तस्वीर को देखा तो लगा जैसे वो मुस्कुराकर कह रही थी, “देख सुजाता! मैं वो फ़ोटो हूँ जो तूने शादी के चौथे दिन ली थी अपने फ़ोन से।”

आप यकीन नहीं करोगे की बुखार से बदन दर्द था मगर इस तस्वीर को देखकर अचानक से गायब हो गया।और मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी। इस एक याद ने उस छह साल पुरानी नई दुल्हन की सारी यादें ताज़ा कर दी। लगा जैसे याद नहीं कोई कैप्सूल हो जिसने बुखार को हर लिया हो।

वैसे सही है न, कभी-कभी यादों की कैप्सूल भी आपकी तबियत कुछ देर के लिए ठीक कर सकती है, वो भी बिना किसी साइडइफेक्ट के।

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है? कोई याद ऐसी है जिसने आपके मुरझाए से मन और तन को खिला दिया हो? बताइएगा मुझे।

Leave a Reply

%d bloggers like this: