परवाह

माँ खुम्मा लगाते हुए
माँ खुम्मा लगाते हुए

ज़िंदगी में कुछ चीज़े ऐसी होती है जिनसे बहुत लगाव होता है। इतना कि वक़्त भले आपके साथ हो ना हो, उम्र भले अपने पड़ाव की तरफ तेजी से अग्रसर हो जाए, मगर इन चीजों से मोह छूटे नहीं छूटता है। वो चीज़ें कुछ भी हो सकती हैं। आपके रिश्ते, आपका प्यार, आपका काम, आपके कुछ निजी शौक़, आपके सींचे हुए पेड़ पौधे या फिर आपकी खेती बाड़ी।


लगाव जब गहरा हो जाता है तो उनसे छुड़ाव भी उतना ही मुश्किल होता जाता है।

पहले मुझे ये सब कहने की बातें लगती थी लेकिन आज मुझे कुछ ऐसा नज़ारा देखने को मिला कि मुझे ये बातें सच लगने लगी। बात कुछ यूँ है कि लगभग छ: सात सालों बाद मैं अपने खेतों में गई। हालाँकि खेत अब बंजर पड़ गए क्योंकि माँ का शरीर खेती करने की इजाजत अब नहीं देता है। इसलिए नहीं कि माँ बूढ़ी हो गई। वो तो अभी साठ की उम्र की सीढ़ी भी नहीं चढ़ी है लेकिन पैर पर रॉड होने के कारण वो ज्यादा काम नहीं करती है और फिर काम करने के लिए माँ अकेले भी हो गई।


हाँ तो, खेतों में जब मैं गई तो मेरी सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गई। क्या रौनक हुआ करती थी इन खेतों में? चारों तरफ पेड़ पौधे, आस-पास, ऊपर नीचे लोगों की बातें, सामने नदी का शोर, गाय की आवाज और बैलों के गले की घंटी का बजना। सब लोग मस्त मगन होकर अपने काम में लगे रहते थे। ना हाथों पर मिट्टी लगने का दुख होता था, ना चेहरे को सन टैन से काला पड़ने का डर। ना पीठ को भारी घास ढोने की थकान होती थी, ना टेबल पर सजे खाने की परवाह। खेतों की गुड़ाई से लेकर कटाई, घास की कटाई से लेकर लगाई समेटने तक का सारा सफर आँखों के सामने आकार इतराने लगा।


बहुत सी यादें जुड़ी है इन खेतों से लेकिन बदलते वक़्त और शहरी चकाचौंध कभी कभी इन यादों को धुंधला कर देती है। कभी अगर आपके सामने कुछ इनसे जुड़ी बात आ जाए तो यह यादें वापस अपना धुंधलापन खोकर साफ भी होने लगती है। खैर, मुद्दा यहाँ इन खेतों का नहीं है। मुद्दा यहाँ ये है कि, हमारी माँयें, हमारी दादियाँ, ताईजी ये सब लोग अपने शरीर की परवाह किये बिना, अपनी उम्र का लिहाज किये बिना इनको छोड़ क्यों नहीं पाती हैं? आज मुझे ये बात समझ आई है।


जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि माँ के पैर में रॉड है और इसी कारण हमारी खेती बंजर पड़ी है। कुछ खेत लोगों को दिए हैं लेकिन जो खेत लोगों ने नहीं लिए उनमें अब हल नहीं लगता है जिस कारण उनमें घास उग जाती है। माँ उस घास को हर साल काटती है बिना किसी मकसद के। ना हमारी गाय भैंस है, ना उस घास को कोई लेकर जाता है। कभी बारिश की वजह से वो सड़कर खराब हो जाती है, तो कभी जंगल में आग की वजह से वो जल जाती है। हाँ, कभी अगर लोगों को जरूरत होती है तो वो लेकर जाते हैं। हमारे लाख मना करने पर भी माँ सुनती नहीं है। जाने कितनी बार माँ को पैर की दिक्कत हो गई है। दूसरे पैर में साईटिका भी है। इंजेक्शन लगा लगा कर ठीक किया है। दवाई खाती है मगर सुधरती तब भी नहीं है।


कल माँ के कहने पर मैं भी उनके साथ घास लगाने को खेत गई। आपको बात दूँ जब घास कटती है तो उसको सुखाने डाला जाता है, फिर उनकी पुलिया बनाकर उसका खुम्मा (खुम्मा को बाकी जगह कुछ और बोला जाता है जिसका मुझे ज्ञान नहीं है) लगाया जाता है। ये खुम्मा किसी पेड़ या लोहे के पोल पर लगाया जाता है। और दूसरा बंदा पुलिया को बॉल की तरह थ्रो मारकर खुम्मा लगाने वाले के पास फेंकता है। यही काम कल मेरा भी था। इस घास को लगाते वक़्त मैंने जब माँ की शिद्दत देखी जब जाकर मुझे एहसास हुआ कि इनको चाहे हम कितना डाँट ले, कितना रोक ले ये नहीं मानने वाली है। क्योंकि इन सबसे उनकी भावनाएं जुड़ी है, उनके सुख-दुख जुड़े हैं। उनका अकेलापन और उनका मनोरंजन जुड़ा है। वोइन सब में रमीं हैं। वो ये सब काम करते करते बड़ी हुई हैं। वो खुद को इनसे दूर नहीं रख पाती हैं। इसलिए नहीं की उन्हें किसी चीज का लालच है। लालच होता तो हर चीज का होता लेकिन नहीं । जहाँ लालच का मकसद खत्म हो जाता है वहाँ एहसास और उनसे जुड़े लगाव का भाव शुरू होता है। यही सब कल मैंने माँ की आँखों में देखा उनकी बातों में सुना।


यहाँ कोई मोह नहीं था बल्कि परवाह थी। उन खेतों की जहाँ कभी फसल उगती थी, उन गायों की जिनके लिए वो ये घास लेकर जाती थी। वो घास जिसके बदले में गाय जो दूध देती थी वो उससे अपने बच्चों को बहलाकर जल्दी काम से घर लौटने का आश्वासन देती थी। जिस मिट्टी में उनकी आधी उम्र कट गई, जिस घास को काटते काटते उन्होंने अपने दुख सुख काटे हैं। उनके लिए ये सब था। क्योंकि घास की वजह से अपने खेतों को जंगल बनते शायद माँ नहीं देख सकती है इसलिए अपने सारे दुख भूलकर हर बार वो इसे समेटने लगती है।


क्योंकि कुछ चीजों की परवाह कभी कम नहीं होती है।

1 Response

  1. बिलकुल सच ! जो ज़िन्दगी के ऐसे तजुरबों से गुज़रे हैं, ऐसे अहसासों को जिन्होंने पाला और समेटा है: वे इस लेख की रूह को अपने अंदर महसूस कर सकते हैं ।

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